भारत का भारतीयकरण आवश्यक

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

भारतीयकरण एक नारा नहीं जीवन-दर्शन है, एक प्रतिक्रिया नहीं, ऐतिहासिक प्रक्रिया है। अनादिकाल से भारत अनेक जातियों तथा जीवन-प्रवाहों का संगम रहा है। संघर्ष और समन्वय के माध्यम से विभिन्न जातियाँ भारत में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि इनको आज अलग-अलग नहीं किया जा सकता। छोटी-छोटी जलधाराओं को अपने में समेटकर, भारत की राष्ट्रीय जीवनधारा अविच्छिन्न बहती रही है। परायों को अपना बनाने का नाम है भारतीयकरण। परकीय को स्वकीय का स्वरूप देने का नाम है भारतीयकरण। यह कार्य अनादिकाल से चल रहा है। और यह यज्ञ अनन्तकाल तक चलेगा। भारतीयों का भारतीयकरण करने की बात कुछ लोगों को अटपटी भले ही लगती हो किन्तु क्या यह सच नहीं है कि जन्म से भारतीय होते हुए भी मन, वचन तथा कर्म से भारतीय होने वालों की संख्या देश में उंगली पर गिनी जा सकती है? आज इस देश में बाह्यण मिलते हैं, हरिजन दिखाई देते हैं, सिख पहचाने जा सकते हैं, जैन अलग से विराजमान हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, प्रदेशों के आधार पर बंटे हुए लोग हैं, भिन्न-भिन्न भाषाये बोलने वाले व्यक्ति हैं, लेकिन सम्पूर्ण भारत के प्रति निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों की संख्या उंगली पर गिनने लायक है। कभी-कभी भारत को देखकर एक भीड़ का भ्रम होता है। भीड़ का कोई एक गन्तव्य नहीं होता न उसका एक मन्तव्य होता है। देश की जनता को एक महान् लक्ष्य तथा एक निश्चित दिशा देने का नाम है भारतीयकरण।

प्रधानमंत्री (श्रीमती इंदिरा गाँधी) बड़े भोलेपन से कहती हैं- जो भारतीय हैं, उनका भारतीयकरण कैसा? तो मैंने कहा- जो राष्ट्र का है. उसका राष्ट्रीयकरण कैसा? हम सब इन्सान हैं। मगर कवि, दार्शनिक हमसे कहते हैं- इन्सान बनो- केवल नाम से नहीं, रूप से नहीं, शक्ल से नहीं, हृदय से, बुद्धि से, संस्कार से जान से। भारतीय हम सब हैं, भारत में पैदा हुए हैं, लेकिन भारत के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए। अभी चण्डीगढ़ में क्या हुआ, कल बेलगाँव में क्या होने वाला है, पश्चिमी बंगाल में माओत्सेतुग को अपना राष्ट्रपति बताने वाले माओ के मानसपुत्र ‘गीता’ और ‘गीतांजलि’ को तिलांजलि देकर माओ की लाल पुस्तक चमका रहे हैं- क्या उनका भारतीयकरण करने की आवश्यकता नहीं है? भारतीयकरण का सम्बन्ध केवल मुसलमानों से नहीं है। भारतीयकरण के अन्तर्गत देश की सकल जनता आती है। भारतीयकरण का एक ही अर्थ है भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति, चाहे उनकी भाषा कुछ भी हो, मजहब कुछ भी हो उनका प्रदेश कुछ भी हो वह भारत के प्रति अनन्य व अविभाज्य निष्ठा रखें। भारत पहले होना चाहिए, बाकी का सब बाद में। देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर सेकुलरवाद को मजबूत नहीं किया जा सकता। सेकुलरवाद का नारा कोई कांग्रेस पार्टी का नारा नहीं है. यह इस देश की संस्कृति में से निकला हुआ मंत्र है। क्या भारत की स्वाधीनता के बाद भारत को हिन्दू-राज घोषित नहीं किया जा सकता था? पाकिस्तान ने किया, हमने नहीं किया। क्यों? इसलिए कि हमारी संस्कृति उसकी इजाजत नहीं देती। स्वयं हिन्दुत्व में उपासना की अनेक पद्धतियां हैं। हमने कभी ऐसा नहीं कहा- एक किताब को मानो, अमुक व्यक्ति में ईमान लाओ, नहीं तो दोजख में जाना पड़ेगा। सत्य एक है, लेकिन विद्वान् लोग भिन्न-भिन्न रूप में उसकी व्याख्या करते हैं। परमात्मा एक ही है, लेकिन उसकी प्राप्ति के अनेकानेक मार्ग हो सकते हैं। आज सेक्यूलरिज्म का मतलब हो गया है- हिन्दू विरोध। नान-एलाइनमेन्ट की तरह इस सरकार के सेक्यूलरिज्म को भी सन्देह की नजरों से देखा जा रहा है। यह सन्देह दूर करना होगा।

मुझे अपने हिन्दुत्व पर अभिमान है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं मुस्लिम-विरोधी हूँ या इस्लाम से मेरा कोई झगड़ा है। लेकिन जब मजहब के साथ राजनीति को मिलाया जाता है और जब उसके आधार पर सत्ता हथियाने की कोशिश की जाती है, जब आप पृथकता को बढ़ावा देते हैं, जब आप रब्बात के सम्मेलन में जाने का फैसला करते हैं, तब साम्प्रदायिकता बढ़ती है। यह साम्प्रदायिकता दुधारी तलवार की तरह से है। एक तरफ की साम्प्रदायिकता की आग जलाकर दूसरी तरफ की साम्प्रदायिकता को शांत नहीं कर सकते। हर एक को अपने गिरहबान में मुँह डालकर देखना चाहिए। राष्ट्र की एकता को अगर मजबूत करना है, तो वह राजनीतिक सौदेबाजी के आधार पर नहीं हो सकती।

जिस प्रकार भारतीयकरण का सम्बन्ध एक वर्ग से नहीं, सम्पूर्ण समाज से है, उसी प्रकार भारतीयकरण की परिधि में जीवन का केवल एक अंग नहीं, समग्र जीवन आता है। राजनीति, अर्थ, शिक्षा, समाज-रचना सभी क्षेत्रों में भारतीय जीवन-मूल्यों के आधार पर नव निर्माण करना भारतीयकरण का अर्थ है। आर्थिक क्षेत्र में भारतीयकरण का अर्थ है एक स्वावलम्बी भारत की रचना करना। जब हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे तब हम स्वदेशी के मन्त्र का जागरण करते थे. लेकिन आज हमारे यहाँ विदेशी पूँजी, विदेशी साधन, विदेशी तकनीकी ज्ञान, विदेशी प्रेरणा, विदेशी प्रतिभा अर्थात् स्वावलम्बी होने के बजाय हम परावलम्बी हो गये हैं। रूस और अमरीका पर हमारी निर्भरता एक खतरनाक स्थिति तक पहुँच गई है। इसका परिणाम हमें राजनीतिक क्षेत्र में भी भुगतना पड़ रहा है। हम भौतिक वस्तुओं के राष्ट्रीयकरण की बातें तो कहते हैं पर मनों के राष्ट्रीयकरण की बात नहीं सोचते। वस्तुतः राष्ट्रीयकरण और भारतीयकरण समानार्थक शब्द है। किन्तु राष्ट्रीयकरण से जहाँ मात्र सरकारीकरण की गंध आती है, वहाँ भारतीयकरण से सम्पूर्ण समाज को परिवर्तित और संगठित करने का सबल स्वर निकलता है। हमारा देश विविधताओं से परिपूर्ण है। ये विविधतायें हमारे जीवन में समृद्धि की द्योतक है. लेकिन विविधता के मूल में एकता निवास करती है। इस एकता का ही नाम है भारतीयता। यह भारतीयता भाषा, उपासना पद्धति और प्रदेश की सीमाओं से परे किन्तु साथ ही उनको स्वयं में समाहित करने वाली है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, जन जन के हृदय हृदय में, भारतीयत्व का साक्षात्कार और उसके साथ स्वयं को एकाकार करना, यही आज की आवश्यकता है। इस एकता को बलशाली बनाने का नाम है भारतीयकरण। भारतीयकरण आधुनिकीकरण का विरोधी नहीं है। न भारतीयकरण एक बंधी बंधाई परिकल्पना है। हमें भारत को एक आधुनिक राष्ट्र का रूप देना है। किन्तु आधुनिकता की होड़ में हम अपनेपन को भुला न दें। भारतीयकरण हमारे जीवन और जागरण का प्रमाण है। यह हमारी गतिशीलता और विकास का द्योतक है। यह इस संकल्प का उद्घोष है कि हम अपने उज्ज्वल अतीत से प्रेरणा लेकर उज्ज्वलतर भविष्य का निर्माण करने के लिए सतत सघर्षशील हैं।