अटल जी की प्रिय व प्रतिनिधि कवितायें

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

आओ फिर से दिया जलाएँ...

भरी दुपहरी में अँधियारा, सूरज परर्छाइं से हारा, अन्तरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ। हम पड़ाव को समझे मंजिल, लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल, वर्तमान के मोहजाल में, आने वाला कल न भुलाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ। आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा, अपनों के विध्नों ने घेरा, अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दध...
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मन की फकीरी पर

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी ऊँचा दिखाई देता है। जड़ में खड़ा आदमी नीचा दिखाई देता है। आदमी न ऊँचा होता है, न नीचा होता है, न बड़ा होता है, न छोटा होता है। आदमी सिर्फ आदमी होता है। पता नहीं इस सीधे, सपाट सत्य को दुनिया क्यों नहीं जानती? और अगर जानती है, तो मन से क्यों नहीं मानती? इससे फर्क नहीं पड़ता कि आदमी कहाँ खड़ा है? ...
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गीत नहीं गाता हूँ

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं,टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ। ,गीत नहीं गाता हूँ... पीठ में छुरी सा चाँद, राहु गया रेखा फाँद, ,मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ। आत्मा की प्यास बुझती जा रही है। गीत नहीं गाता हूँ.....
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गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे वासन्ती स्वर, पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,। झरे सब पीले पात,कोयल की कुहुक रातप्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ। । गीत नया गाता हूँ। टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी? अन्तर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।,हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।...
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इतनी ऊँचाई कभी मत देना

ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है, जमती है सिर्फ बर्फ, जो कफन की तरह सफेद और मौत की तरह ठंडी होती है। खेलती, खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। जो जितना ऊँचा, उतना ही एकाकी होता है, हर भार को स्वयं ही ढोता है, चेहरे पर मुस्काने चिपका, ...
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टूट सकते हैं मगर झुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते। सत्य का संघर्ष सत्ता से, न्याय लड़ता निरंकुशता से, अंधेरे ने दी चुनौती है, किरण अन्तिम अस्त होती है। दीप निष्ठा का लिए निष्कम्प, वज्र टूटे या उठे भूकम्प, यह बराबर का नहीं है युद्ध, हम निहत्थे, शत्रु हैं सन्नद्ध, हर तरह के शस्त्र से हैं सज्ज, ...
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आतंकित जब गली-गली है

तन पर पहरा, भटक रहा मन, साथी है केवल सूनापन, बिछुड़ गया क्या स्वजन किसी का, क्रन्दन सदा करुण होता है। दूर कहीं कोई रोता है.... जन्म दिवस पर हम इठलाते, क्यों न मरण-त्यौहार मनाते, अंतिम यात्रा के अवसर पर, आँसू का अशकुन होता है। दूर कहीं कोई रोता है... अंतर रोये, आँख न रो...
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जीवन बीत चला

कल, कल करते, आज हाथ से निकले सारे, भूत भविष्यत् की चिंता में वर्तमान की बाजी हारे, पहरा कोई काम न आया, रसघट रीत चला। जीवन बीत चला.. हानि-लाभ के पलड़ों में तुलता जीवन व्यापार हो गया, मोल लगा बिकने वाले का, बिना बिका बेकार हो गया, मुझे हाट में छोड़ अकेला, एक-एक कर पीत चला। जीवन बीत चला.. ...
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आओ, मन की गाँठें खोलें

यमुना तट, टीले रेतीले, घास-फूस का घर डाँडे पर, गोबर से लीपे आँगन में, तुलसी का बिरवा, घण्टी स्वर, माँ के मुँह में रामायण के दोहे-चौपाई रस घोलें! आओ, मन की गाँठें खोलें। बाबा की बैठक में बिछी चटाई, बाहर रखे खड़ाऊँ, मिलने वाले के मन मंे असमंजस जाऊँ या न जाऊँ? माथे तिलक, नाक पर ऐनक, पोथी खुली, स्वयं से बोलें। आओ, मन की ग...
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आंधियों में जलाए हैं, बुझते दिए

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा कोई इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा जिन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उम्र क्या? दो पल भी नहीं, जिन्दगी-सिलसिला, आज कल की नहीं, मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे न आ, ...
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राह कौन सी जाऊ मैं

चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर, चलँू आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? सपना जन्मा और मर गया, मधु ऋतु में ही बाग झर गया, तिनके बिखरे हुए बटोरूँ या नव सृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? दो दिन मिले उधार में, घाटे के व्यापार में, क्षण-क्षण का हिसाब जोड़ूँ या पूँजी शेष लुटाऊँ ...
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पुनः चमकेगा दिनकर

आजादी का दिन मना, नई गुलामी बीचः सूखी धरती, सूना अंबर, मन - आँगन में कीचः मन-आँगन में कीच, कमल सारे मुरझाए, एक-एक कर बुझे दीप, अँधियारे छाए, कह कैदी कविराय न अपना छोटा जी कर, चीर निशा का वक्ष पुनः चमकेगा दिनकर। ...
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मन का चैन उड़ा देते हैं

पेकिसी रात को मेरी नींद अचानक ऊचट जाती है, आँख खुल जाती है, मैं सोचने लगता हूँ कि, जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का आविष्कार किया थाः वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण नरसंहार के समाचार सुनकर, रात को सोये कैसे होंगे? दाँत में फँसा तिनका, आँख की किरकिरी, पाँव में चुभा काँटा, आँखों की नींद, मन का चैन उड़ा देते हैं। स...
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जो हम पर गुजरी

विश्व शान्ति के हम साधक है, जंग न होने देंगे ! कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी, खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी, आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा, एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी, युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे। जंग न होने देंगे । हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा, मुँह में शान्ति, बगल म...
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मस्तक नहीं झुकेगा

एक नहीं, दो नहीं, करो बीसों समझौते पर स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा। अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता अश्रु, स्वेद, शोणित से सिंचित यह स्वतंत्रता त्याग, तेज, तप, बल से रक्षित यह स्वतंत्रता प्राणों से भी प्रियतर यह स्वतंत्रता। इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो चिनगारी का खेल बुरा होता है ...
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न दैन्यं न पलायनम्

कर्तव्य के पुनीत पथ को हमने स्वेद से सींचा है, कभी-कभी अपने अश्रु और-प्राणों को अर्ध्य भी दिया है। किन्तु, अपनी ध्येय-यात्रा में-हम कभी रुके नहीं हैं। किसी चुनौती के सम्मुख कभी झुके नहीं हैं। आज, जब कि राष्ट्र-जीवन की, समस्त निधियाँ, दाँव पर लगी हैं, और एक धनीभूत अँधेरा-हमारे जीवन के सारे आलोक को निगल लेना चाहता है, हमें ध...
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किन्तु मरण की माँग करूँगा

मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु मरण की माँग करूँगा। जाने कितनी बार जिया हूँ, जाने कितनी बार मरा हूँ। जन्म-मरण के फेरे से मैं, इतना पहले नहीं डरा हूँ। अन्तहीन अँधियार ज्योति की, कब तक और तलाश करूँ। मैंने जन्म नहीं मांगा था, किन्तु मरण की माँग करूँगा। बचपन, यौवन और बुढ़ापा, कुछ दशकों में खत्म कहानी। फिर-फिर जीना, फिर-फिर मरना, यह मजबूरी या मनमानी? पूर्व जन्म के पूर्व बली, दुनिया का द्वारा...
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स्वतंत्रता दिवस की पुकार

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता-आजादी अभी अधूरी है। सपने सच होने बाकी हैं, रावी की शपथ न पूरी है।। जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई। वे अब तक हैं खानाबदोश गम की काली बदली छाई।। कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आँधी-पानी सहते हैं। उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं।। भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाये जात...
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उनकी याद करें

जो बरसों तक लड़े जेल में, उनकी याद करें। जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें। याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को, कोल्हू में जुट तेल पेरते, सावरकर से बलिदानी को। याद करें बहरे शासन को, बम से थर्राते आसन को, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु के आत्मोत्सर्ग पावन को। अन्यायी से लड़ें, दया की मत फरियाद करें। उनकी...
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सपना टूट गया

हाथों की हल्दी है पीली, पैरों की मेहँदी कुछ गीली पलक झपकने से पहले ही सपना टूट गया दीप बुझाया रची दिवाली लेकिन कटी न मावस काली व्यर्थ हुआ आवाहन स्वर्ण सबेरा रूठ गया। सपना टूट गया । नियति नटी की लीला न्यारी सब कुछ स्वाहा की तैयारी अभी चला दो कदम कारवाँ साथी छूट गया। सपना टूट गया। ...
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कदम मिलाकर चलना होगा

बाधाएँ आती है आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पाँवों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों से हँसते हँसते, आग लगा कर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा । हास्य-रुदन में, तूफानों में, अमर असंख्यक बलिदानों में, उद्यानों में, वीरानों में, अपमानों में, सन्मानों में, उन्नत मस्तक, उभरा सीना, पीड़ाओं में पलना होगा! कदम मिलाकर चलना होगा। उजियारे में, अंधकार में, कल कछार में, बीच धार मे...
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फिर यह कैसा बन्धन है

कवि आज सुना वह गान रे, जिससे खुल जाएँ अलस पलक, नस-नस में जीवन झंकृत हो, हो अंग-अंग में जोश ललक। यह भूख-भूख सत्यानाशी बुझ जाए उदर की जीवन में। हम वर्षों से रोते आए अब परिवर्तन हो जीवन में। क्रन्दन-क्रन्दन चीत्कार और, हाहाकारों से चिर परिचय। कुछ क्षण को दूर चला जाए, यह वर्षों से दुख का संचय। अरे! हमारी ही हड्डी पर, इन दुष्टों ने महल रचाए। हमें निरन्तर चूस चूस कर, झूम-झूम कर कोष बढ़ाए। रोटी-र...
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