संग्रहणीय लेख

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप

राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चले। राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड़-तोड़कर नहीं बनाया जा सकता। इनका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है। उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और ...

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भारतीय भाषाओं व हिन्दी का सशक्तिकरण आवश्यक

हिन्दी भारत की राजकाज, शिक्षा दीक्षा तथा न्यायदान की भाषा बनने की लड़ाई उसी दिन हार गई जिस दिन संविधान के निर्माताओं ने 1950 में एक विदेशी भाषा को आगामी 15 वर्षों के लिए स्वतंत्र भारत की राजभाषा बनाए रखने का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय ले लिया। यदि हिन्दी को नई दिल्ली में आना था, तो वह कलम की एक ही नोक से आ सकती थी, उसे किस्तों में लाने के फैसले का विफल होना निश्चित था और वह विफलता उजागर हो गई। ...

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भारत का भारतीयकरण आवश्यक

भारतीयकरण एक नारा नहीं जीवन-दर्शन है, एक प्रतिक्रिया नहीं, ऐतिहासिक प्रक्रिया है। अनादिकाल से भारत अनेक जातियों तथा जीवन-प्रवाहों का संगम रहा है। संघर्ष और समन्वय के माध्यम से विभिन्न जातियाँ भारत में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि इनको आज अलग-अलग नहीं किया जा सकता। छोटी-छोटी जलधाराओं को अपने में समेटकर, भारत की राष्ट्रीय जीवनधारा अविच्छिन्न बहती रही है। परायों को अपना बनाने का नाम...

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