अतुलनीय अटलजी: प्रेरक जीवन दर्शन

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

‘‘देखने में सीधे-सादे लेकिन मौलिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता दूरदर्शिता, सबको साथ लेकर चलने वाले का जो गुण उन्होंने प्रकट किया, उसने नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का काम किया। ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त करके भी उन्होंने नौकरी नहीं की, वे परिवार के बंधनों में नहीं बँधे, शरीर का कण-कण और जीवन का क्षण-क्षण उन्होंने भारत माता के मस्तक को सौभाग्य के सिंदूर से मंडित करने के लिए समर्पित कर दिया। वाणी में संयम, विचार में सम्पूर्ण देश, सबको साथ लेकर चलने की भावना, जो भी उनके सम्पर्क में आये, वे आज भी उनके अभाव का अनुभव करेंगे। हमें उनकी पवित्र स्मृति को हृदय में संजोकर ध्येय पथ पर आगे बढ़ना होगा। राजनीति उनके लिए साधन थी, साध्य नहीं। वे राजनीति का आध्यात्मीकरण करना चाहते थे। वे भारत के उज्जवल अतीत से प्रेरणा लेते थे तथा उज्ज्वलतर भविष्य का निर्माण करना चाहते थे। उनकी आस्थाएँ सदियों पुराने अक्षय राष्ट्र-जीवन की जड़ों से रस ग्रहण करती थी किन्तु वे रूढ़िवादी नहीं थे। भविष्य के निर्माण के लिए वे भारत को समृद्धिशील आधुनिक राष्ट्र बनाने की कल्पना लेकर चले थे। वे महान चिन्तक थे। चिन्तन के क्षेत्र में वे बंधे-बंधाये रास्तों में चलने के हामी नहीं थे, इसलिए उन्होंने भारतीय जनसंघ (वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी) को ऐसा विकसित किया जो अतीत की गौरव-गरिमा को लेकर चलता है और जो आने वाले कल की चुनौती की सामना करने के लिए भी सन्नद्ध है। पंडितजी जिस कार्य के लिए जन्मे, जीए और जूझे, उसी के लिए हौतात्म्य स्वीकार कर उन्होंने अपना जीवनव्रत पूर्ण कर लिया। उनके कार्य व्यक्तिनिष्ठ नहीं, तत्वनिष्ठ थे। उन्होंने सदैव आदर्शाे पर बल दिया और सिद्धांतों में जीना सिखाया।’’ भले ही ये अभिकथन हम सभी के आदर्श, मार्गदर्शक, गौरव-पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपने नेता महामना पंडित दीनदयाल उपाध्याय के लिए 12 फरवरी 1968 को लोकसभा और उसके पूर्व 11 फरवरी 1968 को अपने आवास 30, राजेन्द्र प्रसाद मार्ग में आयोजित ‘श्रद्धांजलि सभा’ में कही हो लेकिन ये शब्द और इन शब्दों में अन्तर्निहित भावना व सच्चाई आज की तिथि में अटल बिहारी वाजपेयी जी के सन्दर्भ में अक्षरशः सही, सटीक, सार्थक एवं समीचीन है। अटलजी अप्रतिम, अतुलनीय व अनोखे थे, जो हमारी लोक-स्मृति में सदैव प्रेरणा के श्रोत के रूप में जीवित और जीवंत रहेंगे।

मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे इतने महान, विराट व उदार व्यक्तित्व के स्वामी अटलजी को निकट से देखने और अनुभूत होने का सुअवसर मिला। उनकी छवि जब भी याद आती है तो रोम-रोम अनायास ही पुलकित हो उठता है। मुझे गर्व है कि मेरे हाथों ने उनके चरणों का स्पर्श किया है, मेरे कानों को उनके संभाषणांे को सुनने का मौका मिला। अटलजी की शैली में यदि अटल जी को चित्रित करना हो तो कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। अटल जी माने राष्ट्रीय हितों के रक्षक, अटल जी माने सामाजिक समरसता और सद्भाव के महाकवि, अटल जी माने ऋषि परम्परा के जननेता, अटलजी माने गणतांत्रिक मूल्यों के प्रतिबद्ध पुजारी, अटलजी माने लोकतंत्र के प्रबल प्रहरी, अटलजी माने लोकमान्य तिलक-पराड़कर को धारा के पत्रकार/संपादक, अटल जी माने भारतीय राजनीति में राष्ट्रवादी चेतना के भागीरथ, अटल जी माने सार्थक संसदीय बहसों के पर्याय, अटलजी माने त्याग-तपस्या की प्रतिमूर्ति, अटलजी माने मानवीय संवेदनाओं को जीने वाला बहुआयामी व विराट व्यक्तित्व, अटलजी माने अनासक्त कर्मयोगी, अटलजी माने ज्ञान व अनुभव का अनमोल खजाना, अटलजी माने स्नेह की अविरल वर्षा, अटलजी के व्यक्तित्व का वर्णन हमारे जैसे लोगों द्वारा असंभव है। ‘‘एक जर्रे को समन्दर नज़र आए तो कैसे? कई गं्रथ भी लिख दिया जाय तो भी उनके व्यक्तित्व का समग्र निरूपण नहीं हो पायेगी। अटल जी के पसंदीदा शायरों में एक निदा फ़ाज़ली का शेर है कि-

"हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिस को भी देखना, कई बार देखना।।"

लगता है कि यह शेर अटलजी के लिए ही लिखा गया है, उन्हें हम लोग जितनी बार पढ़ते, देखते और सोचते हैं, उनका और भी अधिक नया और मोहक रूप सामने होता है। कभी लगता है कि अटलजी बहुत बड़े राजनेता व जननायक हैं, तो दूसरे पल प्रतीत होता है कि वे राजनेता से बड़े कवि हैं, फिर उसी क्रम में लगने लगता है कि वे कवि से भी महान लेखक हैं। अकस्मात् लेखक अटलजी से बड़े व महान, संपादक अटल जी लगने लगते हैं। कभी प्रतीत होता है कि अटलजी प्रतिबद्ध राष्ट्रवादी हैं तो दूसरे ही पल वे उतने ही कटिबद्ध मानवता के पैरोकार लगने लगते हैं।

वे ‘‘वसुधैव कुटम्बकम्’’ और माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’’ का नाद करते हुए पूरे विश्व को अपना स्वजन मानते थे। हिन्दी साहित्य में एक अलंकार ‘अनन्वय’’ है जिसमें तुलनीय व्यक्ति की तुलना में कोई अन्य व्यक्ति नहीं मिलता, उसकी तुलना में उनके अलावा कोई अन्य नहीं होता जैसे राम से राम, सिया सी सिया। इसी तरह अटल ‘‘न भूतो न भविष्यत्’’ है, अतुलनीय होने के कारण इस पुस्तक का शीर्षक ‘अतुलनीय अटलजी’ तय किया। वे अनन्वय अलंकार के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। मुझे ईश्वर की असीम अनुकम्पा से 2004-2009 के कार्यकाल वाली 14वीं लोकसभा में उनके साथ सदस्य निर्वाचित होने का भी गौरव प्राप्त है। वे लखनऊ के सांसद थे और मैं उन्नाव से चुना गया था। अटल बिहारी वाजपेयी जी के पसंदीदा शायरों में रघुपति सहाय उपाख्य फिराक गोरखपुरी हुआ करते थे जो अंग्रेजी के विद्धान और उर्दू के शायर थे। विद्यार्थी जीवन में एक बार अटल बिहारी जी प्रयागराज वाद-विवाद प्रतियोगिता में सम्मिलित होने गए जिसमें फिराक गोरखपुरी जी और हरिवंश राय बच्चन निर्णायकों की कमिटी में थे। दोनों विद्वानों ने तरुण अटल की प्रतिभा और वक्तृत्व कला को सराहा, अटलजी का इससे काफी हौसला बढ़ा। एक उर्दू का बड़ा शायर, दूसरा हिन्दी का महाकवि, अटल जी का आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ा। फिराक साहब का एक मशहूर शेर है.......

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख करेंगी हम-असरो
जब भी उनको ध्यान आयेगा तुमने फिराक को देखा है.....
यदि इसी तर्ज पर मुझे कहना हो तो मैं यही कहूँगा कि -
आने वाली पीढ़ी क्या हम खुद पर नाज़ करते हैं।
क्योंकि हमने अटल बिहारी को करीब से देखा है।।

ज्यादातर चर्चा में आता है कि अटलजी पत्रकारिता व साहित्य से राजनीति में आये, बहुत हद तक यह सही भी है लेकिन रेखांकित करने योग्य तथ्य है कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम एवं छात्र राजनीति से अपने लोक अथवा सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की थी। छात्र-नेता चाहे जितनी ऊँचाई पर चले जायें, उनमें छात्र-नेता वाले तत्व जीवन-पर्यन्त रहते हैं और वह अपने बाद वाले छात्र-नेताओं को अतिरिक्त स्नेह अवश्य देता है। पूज्य अटलजी का मुझे अतिरिक्त स्नेह व समय छात्र-नेता होने के कारण भी मिला। उनसे हुई हर मुलाकात आत्मबल बढ़ाती थी, एक आध्यात्मिक और अनिर्वचनीय ऊर्जा से ओत-प्रोत कर देती है जिसे मैं ‘मूकास्वादानवत्’’ शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। अटल जी का पूरा जीवन किसी उपन्यास ने आदर्शवादी प्रतिभाशाली नायक की भाँति है जिसने अपने दौर की दिशा को न केवल बदला अपितु इतिहास में कई अध्याय जोडे़। अटलजी के बिना भारतीय लोकतंत्र व संसद का इतिहास अधूरा है। उनकी प्रेरक जीवनी हर किसी विशेषकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं व कलमकारों को पढ़ना चाहिए। हमारा यथासम्भव प्रयास होगा कि नई पीढ़ी तक अटल से संबन्धित साहित्य पहुँचे।

वर्तमान सदी में राजनीति के ‘अजातशत्रु’ की संज्ञा अटल जी को ही दी जा सकती है, भले ही राज्यसभा में 1 मार्च 1963 को हमारे प्रथम राष्ट्रपति, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, विनम्रता व विद्वता की मूर्ति संविधान सभा के अध्यक्ष विधिज्ञ डा0 राजेन्द्र प्रसाद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अटल जी ने ‘अजातशत्रु’ कहा था, किन्तु हमने राजनीति के जिस ‘अजातशत्रु’ को देखा है वे अटल बिहारी वाजपेयी जी ही हैं। अटल जी ने डा0 राजेन्द्र प्रसाद के लिए जो कहा था, उसका उल्लेख प्रसंगवश जरूरी है। ‘‘मृत्यु ने जिन्हें छीन लिया लेकिन जिनकी कीर्तिगाथा काल के गाल पर अमिट अक्षरों में अंकित रहेगी, उन राजेन्द्र बाबू की स्मृति में मैं भी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। चिंतन-मनन में, भाव में, भाषा मंे, खान-पान में, चाल-ढाल में, रूप-रंग में डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद भारत की सनातन संस्कृति के नित्य नूतन प्रतिनिधि थे। विद्वता के साथ विनय, शासन के साथ सौजन्य, वज्र के समान कठोर किन्तु कुसुम के समान मृदुल, उनका जीवन भावी संतति के लिए सदैव प्रेरणा देता रहेगा। वे ‘अजातशत्रु’ थे सब दलों के, सब मतों के मानने वालों के हृदय में उनके प्रति समान आदर था। वे सबसे अपने थे और उनके निकट जाकर, उनके सान्निध्य में ऐसा लगता था जैसे किसी ऋषि की छत्र-छाया में हम बैठे हैं। पद पाकर भी उन्हें मद नहीं हुआ। भरत के बाद निष्पृहता का आदर्श, उनके जीवन में हमने चरितार्थ देखा।’’

अटल जी भी इसी परम्परा के वाहक थे। इस श्रद्धांजलि से भी उनकी सोच और ज्ञान की गहराई प्रतिबिम्बित होती है। अटल जी भारतीयता और भारतीय मनीषा के मर्मज्ञ थे। इस श्रद्धांजलि में उन्होंने ‘‘वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि’’ सूक्ति का उपयोग किया है जो आचार्य भवभूति द्वारा विरचित ग्रन्थ ‘उत्तररामचरितम्’ से उद्धृत है। इसका मंतव्य है कि महान विभूतियों का स्वभाव विलक्षण होता है, वे एक क्षण वज्र से भी कठोर तथा दूसरे ही क्षण फूल से भी कोमल होते हैं। प्रशासक और प्रतिबद्ध राष्ट्र-नायक अटल जी देश के हित में सचमुच ‘वज्र’ से भी कड़े होते थे। सिद्धांत की कसौटी पर खरा उतरने के लिए उन्होंने अपने शरीर को ‘दधीचि’ की तहर असहनीय कष्ट देकर वज्र की भाँति बना लिया था। आपातकाल और आजादी की लड़ाई के दौरान कठोर कारावास को चुना, इसके ठीक उलट जब गरीबों की पीड़ा सुनते थे तो कवि-मना अटलजी रोने लगते थे, बच्चों में वे बच्चे बन जाते थे। उनमें फूल सी मासूमियत और मृदुलता स्वतः आ जाती थी। अटल जी का जन्म शिंदे की छावनी में 25 दिसम्बर 1924 तद्नुसार पौष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 1981 दिन गुरुवार अथवा वृहस्पतिवार को पंडित कृष्ण बिहारी और माता कृष्णा देवी के चतुर्थ पुत्र के रूप में हुआ, उन पर सदैव ज्ञान के देवता बृहस्पति की असीम कृपा रही। विद्यालय के प्रमाण पत्रों में अटल जी की जन्मतिथि 25 दिसम्बर 1926 अंकित है लेकिन स्वयं अटल जी अपना जन्म वर्ष 1924 मानते थे। कुछ ब्राह्मणों का मत है कि अटल जयंती भारतीय पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष के कृष्ण अमावस्या को हुआ था। अटल जी की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में ही हुई। उन्होंने विक्टोरिया कालेज से स्नातक किया। 1957 में विक्टोरिया कालेज का नाम महारानी लक्ष्मीबाई के नाम पर कर दिया गया। अटल जी विक्टोरिया कालेज के छात्रसंघ के मंत्री और उपाध्यक्ष भी रहे। इसीलिए मैंने पहले ही कहा कि वे छात्र राजनीति से वाया पत्रकारिता व साहित्य, मुख्य धारा की राजनीति को अंगीकृत किया। राष्ट्रवाद के प्रति उनके मन में आग्रह प्रारम्भ से ही रहा, विक्टोरिया कालेज की पत्रिका में 1939 में प्रकाशित उनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं जिसमें उन्होंने तत्कालीन क्रूर ब्रिटानिया हुकूमत को सीधी चुनौती देते हुए निर्णायक संघर्ष का खुला आह्वान किया-

रोटी-रोटी के टुकड़े को बिलख-बिलख कर लाल मरे हैं
इन मतवाले उन्मत्तों ने, लूट-लूट कर गेह भरे हैं।
मानव स्वामी बने और, मानव ही करे गुलामी उसकी।
किसने है यह नियम बनाया, ऐसी है यह आज्ञा किसकी?
रे कवि! तू भी स्वरलहरी से, आज़ आग में आहुति दे।
और वेग से भभक उठें हम, हद्-तन्त्री झंकृत कर दे।

अटलजी की यह प्रथम प्रकाशित कविता इस पुस्तक के अन्तिम (96) पृष्ठ पर पढ़ा जा सकता है। यह कविता लिखते समय अटलजी की उम्र मात्र 15 वर्ष थी और उस समय वे नौवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। इन पंक्तियों से अटल जी की गुलामी के प्रति प्रतिकार और देश के प्रति प्रेम की उत्कट भावना झलक रही है। यदि रचनाकार का नाम न बताया जाय तो लोगों को यह कविता भारतेन्दु ‘हरिश्चन्द्र’, माखन लाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ सदृश महाकवियों में किसी एक द्वारा रचित लगेगी। कवि अटल जो लिखते थे, राजनीतिक कार्यकर्ता व नेता अटल उस पर उसी प्रतिबद्धता से अमल भी करते थे। बयालीस की क्रांति के दौरान अटल जी का सम्पर्क सत्याग्रहियों से बढ़ गया। वे प्रभात-फेरियों और क्रांतिकारी-बैठकों में हिस्सा लेने लगे। ग्वालियर के तत्कालीन कोतवाल ने अटलजी के शिक्षक पिता कृष्ण बिहारी जी को चेताया कि यदि अटल ग्वालियर में रहेंगे तो गिरफ्तार करना पड़ेगा। पिता ने उन्हें बड़े भाई प्रेम बिहारी के साथ पैतृक गांव बटेश्वर के लिए कुछ दिनों की खातिर रवाना कर दिया। अटल बिहारी जी ने बटेश्वर में भी आन्दोलन में सहभाग करने लगे। फलस्वरूप गिरफ्तार हुए और आगरा के बाल कारागार में सजा काटी। चौबीस दिनों की असहनीय जेल यात्रा भी उनके हौसले की उड़ान में बाधा न डाल सकी। लोकमान्य तिलक की तरह अटल बिहारी वाजपेयी जी भी धार्मिक अवधारणाओं का सिद्धहस्त प्रयोग राष्ट्र-जागरण के लिए करते थे, लोगों में देश भक्ति की भावना के प्रसार के लिए वे पौराणिक प्रतीकों का बड़ी सुन्दरता व साफगोई से उपयोग करते थे। अंग्रेजों के जासूस समझ भी नहीं पाते थे और अटल जी अपना काम कर जाते थे। अटल जी के लिए हिन्दुत्व समस्त भारतीयता का प्रतिनिधित्व करता था। ग्वालियर से परास्नातक (एम0ए0) करने के बाद अटल जी ने दयानंद एंग्लो विद्यालय (डीएवी) से कानून की पढ़ाई करने के लिए कानपुर आ गये। अच्छा विद्यार्थी होने के कारण ग्वालियर की रियासत के महाराज श्रीमंत जीवाजी राव सिंधिया ने अटल जी को 75 रुपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति देने का फैसला लिया।

आनंद की बात है कि अटल जी के पिताजी पंडित कृष्ण बिहारी ने भी डीएवी से ही कानून की पढ़ाई करने का मन बनाया। पिता-पुत्र दोनों ही छात्रावास के एक ही कमरे में रहते और एक ही कक्षा में पढ़ने लगे। विद्यार्थी अटल ने 1947 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के खिलाफ एक टोली बनाई और निर्णायक युद्ध का ऐलान किया। जब देश आजाद हो रहा था, एक तरफ पंडित जवाहर लाल नेहरू लाल किले की प्राचीर से उद्बोधन दे रहे थे दूसरी तरफ 15 अगस्त को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्रदेव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण ‘‘जब तक जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है’’ जैसे नारे लगाते हुए राष्ट्रपति भवन तक मार्च कर रहे थे। अटल जी भावना व स्वर दूसरे पक्ष जो दरअसल जनपक्ष था, के साथ थी। इसी दिन अटलजी ने ‘स्वतंत्रता दिवस की पुकार’ शीर्षक से कविता लिखी और वाचन किया इसकी कुछ पंक्तियां निम्नवत् है.....

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता-आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी हैं, रावी की शपथ न पूरी है।
कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो पन्द्रह अगस्त के, बारे में क्या कहते हैं।।

यह कविता अपने आप में इतिहास के संकल्प की गाथा है और आगाह करती है कि हमने जो प्राप्त कर लिया है उसमें मुदित होकर उसे न भूल जायें जो खो दिया है या जो हमारे अमर शहीदों का सपना है। अटलजी भारत का पुराना गौरव प्राप्त करना चाहते थे, उनके वैयक्तिक एवं सार्वजनिक जीवन में अंतर नहीं रहा। वे राष्ट्र, देश व समाज के लिए सदैव समर्पित रहे। उन्होंने राष्ट्र के लिए दल और दल के लिए निजी हितों का हमेशा परित्याग किया तथा राष्ट्रहित में ही स्व-हित का समावेश कर लिया। त्याग के संदर्भ में उनका जीवन दर्शन महामना कौटिल्य के उक्त निर्देश को चरितार्थ करते हुए उन्हें महानता के ऊँचे सोपान पर स्थापित करता है।

त्यजेदेकं कुलस्याऽर्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्राम जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।

अटल जी ने समष्टि के सर्वतोन्मुखी लाभ के लिए जब भी आवश्यकता पड़ी, व्यष्टि अथवा व्यक्तिगत लाभ-अलाभ नहीं देखा। अटलजी की पंडित दीनदयाल उपाध्याय से प्रथम भेंट गणेश शंकर विद्यार्थी की नगरी कानपुर में हुई थी। दीनदयाल उपाध्याय जी ने अटलजी को और अटलजी ने दीनदयाल उपाध्याय को काफी प्रभावित किया। कालान्तर दोनों एक दूसरे के पूरक, प्रतीक और पर्याय बन गये। दीनदयालजी ही अटलजी को लखनऊ लाये। हमारा गौरवशाली इतिहास साक्षी है कि बाद में लखनऊ और अटलजी एक दूसरे की पहचान और कमोबेश हमनाम हो गये।

हालांकि दीनदयाल जी के साथ आने से पहले अटलजी 1942 में लखनऊ स्थित कालीचरण कालेज में आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर (ओटीसी) में आ चुके थे। इसी शिविर में उन्होंने हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय कविता प्रथम बार पढ़ी थी। देश के आजाद होने के बाद नवनिर्माण की चुनौती थी। यहाँ अंगीकृत लोकतंत्र पर एक पक्ष व पार्टी का लगभग एकाधिकार था। उस समय ऐसा लगता था कि किसी अन्य दल अथवा विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है। दीनदयाल जी ने 1947 में राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना राष्ट्रवादी विचारधारा को स्वर व मंच देने के लिए किया। उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादन का दायित्व कविमना व शब्दवेत्ता अटल बिहारी वाजपेयी को दिया। राष्ट्रधर्म का प्रथम अंक 31 अगस्त 1947 को प्रकाशित हुआ। देखते ही देखते ‘राष्ट्रधर्म’ सभी राष्ट्रवादी मन-मानस के लोगों का प्रिय बन गया। दीनदयाल-अटल बिहारी वाजपेयी की जोड़ी ने 14 जनवरी 1947 को ‘‘पांचजन्य’’ के प्रथम अंक को निकाला। ‘‘पांचजन्य’’ में आचार्य सम्पूर्णानन्द, डा0 राममनोहर लोहिया, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, अमृतलाल नागर सदृश महनीय विचारकों व साहित्यकारों ने अपने लेख दिये। यह अटल जी का ही चमत्कार था। ‘‘राष्ट्रधर्म’’ और ‘‘पंाचजन्य’’ पर प्रतिबन्ध भी लगे, प्रतिबन्ध हटे भी, झंझावातों से जूझना और जीत हासिल करना अजेय अटलजी के लिए रोजमर्रा की बातें थीं। जिन परिस्थितियों में सामान्य आदमी टूट कर बिखर जाता है, उन स्थितियों में अटल जी और निखर कर उभरते थे। अटल जी ने ‘‘दैनिक स्वदेश’’ का भी संपादन प्रारम्भ किया। ‘‘स्वदेश’’ के सात ही अंक निकले थे, तत्कालीन सरकार ने इसके दफ्तर पर तालाबंदी कर दी। अटल जी को लखनऊ छोड़कर कानपुर फिर काशी प्रवास करना पड़ा। काशी के विद्वानों ने साप्ताहिक ‘‘चेतना’’ निकाला जिसके संपादन का दायित्व अटलजी को दिया। सन् 1950 में दीनदयाल जी उन्हें ‘‘स्वदेश’’ के संपादन हेतु पुनः लखनऊ बुलाया। अटल जी के लिए पंडित दीनदयाल के कथन पवित्र वाक्य होते थे जिस पर वे आंख बन्द कर विश्वास करते थे। अटल जी के संपादन में पुनः प्रकाशित ‘‘स्वदेश’’ के विमोचन समारोह में पंडित अम्बिका प्रसाद बाजपेयी, डा0 राधा कुमुद मुखर्जी जैसी स्वनामधन्य विभूतियां पधारीं। आर्थिक संसाधनों के अभाव और सिद्धांतों से समझौता न करने की मनोवृत्ति के कारण ‘‘स्वदेश’’ का प्रकाशन पुनः रुक गया। अटल जी की विद्वता और संपादन की खुशबू देश भर में फैलने लगी। विद्वता और गुण के पुजारी सर्वत्र होते हैं, सूक्ति भी है, ‘‘विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन्, स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते’’ अटलजी को दिल्ली ‘‘वीर अर्जुन’’ के निष्पादन के लिए आमंत्रित किया गया। समविचारी होने के कारण अटल जी ने आमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इस अखबार की शुरुआत स्वामी श्रद्धानंद ने की थी। अटल जी अपनी विद्वता, तेजस्विता और परिचयता के बल पर चाहते तो ग्वालियर, लखनऊ, कानपुर, काशी के किसी महाविद्यालय में प्राध्यापक बनकर या फिर किसी स्थापित अखबार के संपादक बनकर सुखमय जीवन बिता सकते थे किन्तु उन्हें विधाता ने इस धरा पर राजनीति की नई धारा को नया आयाम देने के लिए अवतरित किया था। नियति अपना पथ स्वयं बनाती है, हम निमित्त मात्र होते हैं। योगेश्वर कृष्ण का कथन है ‘‘निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्’’। नियति उन्हें पत्रकारिता की परिधि से निकाल कर राजनीति के आकाश पर सूर्य के रूप में स्थापित करना चाहती थी क्योंकि पात्रता व प्रतिबद्धता के दृष्टिकोण से अटल से बेहतर व्यक्ति कोई और नहीं था। पचास के दशक के बाद अटल जी ने पूर्णकालिक राजनीति में प्रवेश किया , तथापि वे साहित्य, लेखन , कविता सदृश विधाओं से जुड़े रहे |

भारतीय राजनीति में 1950 के बाद से प्रथम आम चुनाव का वातावरण बनने लगा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अन्दर नये राजनीतिक दल के निर्माण की भावना उठ रही थी, कुछ नेता व कार्यकर्ता राष्ट्रवादी सोच पर आधारित दल चाहते थे। 6 अप्रैल 1950 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी पंडित नेहरू सरकार से इस्तीफा दे चुके थे। लगभग साल भर के मंथन के बाद तय हुआ कि पार्टी का गठन आवश्यक है। लखनऊ में 21 दिसम्बर 1951 को संघ का प्रादेशिक सम्मेलन पंडित दीनदयाल, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी, माधव प्रसाद त्रिपाठी सदृश नेताओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ जिसमें जन-संघ को राष्ट्रीय राजनीतिक दल बनाने का प्रस्ताव पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने रखा और जिसका पुरजोर अनुमोदन अटलजी ने किया। इसी बीच गुरु गोलवलकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी में कई बार आपसी संवाद हुआ, फलस्वरूप तय हुआ कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय जनसंघ नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई जायेगी। अक्टूबर 21, 1952 को नई दिल्ली में श्यामा प्रसाद जी की अध्यक्षता में जनसंघ का स्थापना अधिवेशन आहूत हुआ। अध्यक्षीय उद्बोधन में आदरणीय श्यामाजी ने गर्जना की, ‘‘हमारे कार्यकर्ता हमेशा यह याद रखें-केवल बलिदान और सतत् सेवा से ही लोगों का विश्वास व समर्थन प्राप्त किया जा सकता है। हम भारत के पुनर्जागरण और पुनर्निर्माण के अभियान के लिए प्रतिबद्ध हैं। भारत माता अपने बच्चों को पुकार रही है। हम अपने धर्म, जाति एवं वर्ग के भेदों को एक तरफ रख दें और भारत माता की सेवा में जुट जाएं। हमारा वर्तमान चाहे जितना अंधकारमय हो, हमारा भविष्य उज्ज्वल है और भारत को विश्व में कई बड़े कार्य करने हैं। हमारी पार्टी का प्रतीक चिहृन दीपक है, वह आशा और एकता, प्रतिबद्धता और साहस का प्रकाश फैला रहा है। हम इस प्रकाश को अपने हाथों में लेकर चलें और उस अंधकार व उदासी को दूर करें, जिसने विभाजन के बाद हमारे राष्ट्र को ग्रस लिया है। हमारी लंबी यात्रा का यह आरंभ मात्र है। सर्वशक्तिमान ईश्वर! हमें शक्ति और साहस दे ताकि हम सदा सही मार्ग पर चल सकें। भय हमें विचलित न कर सके और विलासिता हमें ललचा न सके, ताकि आध्यात्मिक और भौतिक दोनों रूपों में एक महान और महाशक्तिशाली भारत के पुनर्निर्माण में अपना योगदान कर सकें ताकि पुनर्जाग्रत भारत विश्व शांति को बनाये रखने और विश्व के विकास के संवर्धन के लिए एक विश्वसनीय व पवित्र साधक बन सके।’’ माना जाता है कि श्यामा प्रसाद जी ने यह ऐतिहासिक संबोधन अटलजी के सहयोग से तैयार किया था जो एक तरह से सभी राष्ट्रवादियों का सामूहिक व समवेत् स्वर था जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। जितना ये भाषण के वक्त समीचीन है। जनसंघ के प्रथम महासचिव दीनदयाल जी चुने गये। अटल जी की प्रतिभा और समझ को दृष्टिगत रखते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन्हें अपना सचिव बनाया। श्यामा प्रसाद जी के साथ रहते हुए अटल जी ने काफी अनुभव अर्जित किया। दिसम्बर 1952 को कानपुर में अखिल भारतीय जनसंघ का पहला अधिवेशन हुआ। यह एक तरह से दीनदयाल जी व अटल जी की अग्निपरीक्षा थी जिसमें दोनों कुंदन की भाँति कसौटी पर खरे उतरे। पहला आम चुनाव 1952 में सम्पन्न हुआ। जनसंघ सबसे नई पार्टी थी। पार्टी ने 3.10 फीसदी वोट प्राप्त किये और इसके तीन सांसद निर्वाचित हुए। बड़े नेताओं में दीनदयाल जी, अटल जी, नानाजी आदि पार्टी को लड़ाने के लिए खुद चुनाव नहीं लड़े। सिर्फ चार दलों को तीन प्रतिशत से अधिक मत मिले उसमें जनसंघ भी एक थी। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 1952 में जनसंघ के सिर्फ दो प्रत्याशी निर्वाचित हुए। आज तत्कालीन जनसंघ का आधुनिक रूप भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी है। केन्द्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगहों पर सत्तासीन होकर जनसेवा में संलग्न है। जनसंघ के शैशवावस्था में ही संस्थापक, अध्यक्ष और सबसे बड़े नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी जम्मू-कश्मीर आंदोलन करने गये और 23 जून 1953 को महाप्रयाण कर गये। सारा दारोमदार पंडित दीन दयाल उपाध्याय और अटल जी पर आ गया। अकस्मात् शीर्ष नेतृत्व के ही चले जाने पर जनसंघ की स्थिति कैसी हो गई होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। दीनदयाल जी के साथ मिलकर अटल जी ने जनसंघ को न केवल बिखरने से रोका अपितु काफी सशक्त बना दिया। जनसंघ की चर्चा विकल्प के रूप में होने लगी। श्यामाप्रसाद जी के देहावसान के बाद संसद में अटलजी की उपस्थिति अपरिहार्य लगने लगी। इसी बीच 1955 में लखनऊ से लोकसभा सदस्य विजय लक्ष्मी पंडित ने इस्तीफा दे दिया। उपचुनाव में जनसंघ की ओर से अटलजी लड़े। अच्छे वोट मिले लेकिन जीत पंडित जवाहरलाल नेहरू व विजय लक्ष्मी पंडित की रिश्तेदार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिवराजवती नेहरू की हुई। द्वितीय आम चुनाव (1957) में अटल जी तीन लोकसभा क्षेत्रों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से लड़े। बलरामपुर से वे कांग्रेस के प्रत्याशी मशहूर अधिवक्ता हैदर हुसैन को पराजित कर संसद सदस्य निर्वाचित हुए। लखनऊ में वे जीत के करीब पहुँच गये थे किन्तु वामपंथियों ने जनसंघी नेता अटलजी न जीतें, इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी पुलिन बिहारी बनर्जी को वोट करवा दिया। द्वितीय लोकसभा (1957-62) में जनसंघ के सदस्यों की संख्या में एक और मत में 2.83 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अटलजी ने लोकसभा में अपने भाषणों से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। पहली बार लोकसभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू को हिन्दी में बोलने के लिए उत्प्रेरित किया। उन्होंने राष्ट्रहित से जुड़े कई सवाल सदन में उठाये। उनके पास श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ससंदीय जीवन का अनुभव था। वे मेधावी भी थे और मेहनती भी। सांसद होते हुए भी साइकिल से जनसंघ के अजमेरी गेट स्थित कार्यालय, झंडेवालान स्थित आरएसएस के कार्यालय और संसद भवन तीनों जगह पर प्रतिदिन नियमित आते थे। संसद की पुस्तकालय का वे काफी उपयोग करते थे। तीसरी लोकसभा (1962-67) में जनसंघ की लोकप्रियता में काफी वृद्धि दर्ज हुई। तीसरे आम चुनाव में जनसंघ के सदस्यों की संख्या में साढ़े तीन गुणा (14) और वोट प्रतिशत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अटलजी को रोकने के लिए कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बड़ी नेता सुभद्रा जोशी को हरियाणा से बलरामपुर भेजा। वे उस समय अंबाला से सांसद थीं। बलरामपुर में अफवाह फैला दी गई कि सुभद्रा केन्द्रीय मंत्री बनाई जायेंगी, क्षेत्र में सबको नौकरी मिलेगी। इन अफवाहों के कारण अटलजी मात्र दो हजार बावन (2052) मतों के अन्तर से, जीत से वंचित रह गये। एक और बात अटलजी जनसंघ के अन्य प्रत्याशियों को जिताने के लिए बाहर भी यात्रा करते थे, सुभद्रा जोशी बलरामपुर से कहीं बाहर नहीं गई। बलरामपुर लोकसभा में पांच विधानसभा सीटें थीं जिसमें चार पर जनसंघ के प्रत्याशी जीते। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में जनसंघ 49 सीटें जीत कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। इस जीत का श्रेय सर्वाधिक दो विभूतियों को जाता था- एक एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय और दूसरे हमारे अटल बिहारी बाजपेयी जी। संसद में अटलजी के न होने से जनसंघ की मारक क्षमता कम हो गई थी। जनसंघ के शीर्ष नेताओं ने अटलजी को राज्य सभा भेजने का निर्णय लिया, अटल जी ने मना कर दिया क्योंकि वे योद्धा थे, उनका कहना था कि लोगों में पदलोलुप होने का गलत संदेश जायेगा। अटलजी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय व नानाजी देशमुख को राज्य सभा भेजना चाहते थे किन्तु दल के निर्णय के आगे उन्हें झुकना पड़ा। वे उत्तर प्रदेश से राज्य सभा निर्वाचित हुए। तीसरी लोकसभा में चार जगह उपचुनाव हुए। तत्कालीन प्रतिपक्ष ने संयुक्त प्रत्याशी उतारे, फर्रूखाबाद से राममनोहर लोहिया, अमरोहा से जे0बी0 कृपलानी, जौनपुर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय और राजकोट से मीनू मसानी। डा0 लोहिया का चुनाव प्रचार करने जाते समय जनसंघ के अध्यक्ष आचार्य रघुवीर की 14 मई 1963 को कार-दुर्घटना में मृत्यु हो गई। आचार्य रघुवीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, मंगोल, संस्कृत, मंदारिन, तिब्बती, रूसी, पंजाबी, फारसी समेत कई भाषाओं के सिद्ध विद्वान थे। अटलजी को वे और उन्हें अटलजी काफी मानते थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति और हिन्दी को काफी सशक्त किया। आचार्य रघुवीर के कद व किरदार का अध्यक्ष जनसंघ के लिए चुनौती थी। अटलजी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय से जनसंघ का अध्यक्ष बनने का प्रबल आग्रह किया। वे अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे, लगातार 15 वर्ष से महासचिव की भूमिका निभाते हुए जनसंघ रूपी वट वृक्ष को सींच रहे थे। अंततोगत्वा 29-30-31 दिसम्बर को 14वें राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता करना पंडित जी ने स्वीकारा। लगा कि 1967 जनसंघ के लिए शाश्वत शुक्ल पक्ष लेकर आया है। पहले ऐतिहासिक जीत फिर दीनदयाल उपाध्याय जी की अध्यक्षता, अटल जी अभी ढंग से मुदित हुए भी न थे कि काल ने 10 फरवरी 1968 की अर्द्धरात्रि को दीनदयाल जी को छीन लिया। पंडित जी का उत्तराधिकारी कौन होगा? इस प्रश्न का एक ही उत्तर लोगों के मन-मानस में था, वे अटल बिहारी वाजपेयी थे। अटल जी अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे किन्तु नाना जी देशमुख, दत्तोपंत ठंेगड़ी, जगन्नाथ राव जोशी, भाई महावीर, भैरो सिंह शेखावत समेत संघ के कई नेताओं व कार्यकर्ताओं का आग्रह था कि दीनदयाल जी ने पार्टी को जिस स्थान तक अपनी त्याग-तपस्या से पहुँचाया, उससे आगे ले जाने की क्षमता केवल अटलजी में है। 1968 में अटलजी जनसंघ के अध्यक्ष हुए। सितम्बर 7-8 सन् 1968 को इंदौर में अखिल भारतीय जनसंघ की प्रतिनिधि सभा हुई जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी के ऐतिहासिक उद्बोधन ने नवऊर्जा का संचार कर दिया। लोहिया और दीनदयाल पुण्यलोक जा चुके थे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं आचार्य कृपलानी की राजनीतिक सक्रियता सीमित हो चुकी थी। ऐसे समय में उत्पन्न हुए शून्य को अटल जी ने भरा। जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में अटल के प्रथम भाषण के एक-एक शब्दों को सुनकर अथवा पढ़कर ऐसा लगता है कि मानो हम किसी भारतीय संस्कृति के उन्नायक अथवा मनीषी को सुन रहे हों। इस भाषण में अटलजी ने कहा, ‘‘हमें किसी नये राष्ट्र का निर्माण नहीं करना है, बल्कि इस प्राचीन राष्ट्र को आधुनिक काल की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाना है। आर्थवण श्रुति में जब हमने घोषणा की मानो उसी दिन राष्ट्रीयता की उद्घोषणा कर दी। भारतीय राष्ट्र मूलतः एक सांस्कृतिक इकाई है‘‘। इसी भाषण में अटल जी ने साम्प्रदायिकता को चुनौती देते हुए कहा, ‘‘साम्प्रदायिकता के कारण एक बार देश का विभाजन हो चुका है। अब हमें उस दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास की पुनरावृत्ति को रोकना होगा। जो लोग सेकुलर शब्द का अनुवाद ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ करते हैं, वे न धर्म को समझते हैं और न सेकुलर शब्द की मूल भावना को ही ग्रहण कर पाते हैं। सेकुलर का अर्थ धर्म-विरोधी या धर्मविहीन नहीं होता। भाषण लम्बा किन्तु आकर्षक और उत्प्रेरक था। अंत में अटल जी ने कहा, ‘‘आंदोलनात्मक तथा रचनात्मक दोनों ही प्रकार के कार्यक्रम अपना कर हमें जनता के कष्टों का निवारण करने के लिए आगे बढ़ना है। देश को हमसे बड़ी आशायें हैं। हम परिस्थिति की चुनौती स्वीकार करें। आंखों मंे एक महान भारत के सपने, हृदयों में उन सपनों को सत्यसृष्टि मंे परिणत करने के प्रयत्नों की पराकाष्ठा करने का संकल्प, भुजाओं में समूची भारतीय जनता को समेट कर उसे सीने से लगाये रखने का सात्विक बल और पैरों में युग परिवर्तन की गति लेकर हमें चलना है। डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डा0 रघुवीर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पवित्र स्मृति से प्रेरणा लेकर हम कर्तव्य-पथ पर कदम बढ़ायें। विजय हमारी होगी, आने वाला कल हमारा होगा। ‘‘अटल जी के भाषण ने कार्यकर्ताओं को उमंग से भर दिया। जरा सा संपादित पूरा भाषण इस पुस्तक में पृष्ठ संख्या 56 से 65 के मध्य अध्ययनार्थ संकलित है। अटल जी लगातार चार वर्ष 1968 से 1972 तक जनसंघ के अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने नई टीम विकसित की और सामूहिक नेतृत्व की परम्परा डाली। चौथी लोकसभा (1967) के आम चुनाव में जनसंघ को कांग्रेस के बाद सर्वाधिक 9.41 प्रतिशत मिले थे। अटल जी का राज्यसभा का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था, फिर वे बलरामपुर लोकसभा लड़े और भारी अंतर से जीते। जनसंघ के 35 सदस्य निर्वाचित हुए लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी जनसंघ बन गई। सन् 1972 में अटलजी ने अध्यक्ष पद छोड़ने का मन बनाया। उनकी खास बात थी कि वे किसी पद से चिपके रहने के पक्षधर नहीं थे और यदि उनके मन में बात बैठ गई तो बड़े से बड़ा त्याग करने में एक पल भी नहीं लगाते थे। वे इन अर्थो में सच्चे मनस्वी थे। अटल जी ने अपना उत्तराधिकारी लालकृष्ण आडवाणी को चुना। दिसम्बर 1972 को नानाजी देशमुख, भाई महावीर, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, सुन्दर सिंह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे, जगन्नाथ राव जोशी सदृश वरिष्ठों की सहमति बनाकर उन्होंने अपेक्षाकृत युवा आडवाणी जी को अध्यक्ष बनवा दिया। कानपुर अधिवेशन में बाकायदा अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुए। पांचवीं लोकसभा (1971-1977) के दौरान देश पर आपातकाल आरोपित किया गया। 25 जून 1975 को इमर्जेन्सी की घोषणा के बाद अटल बिहारी वाजपेयी जी को बंगलुरू (कर्नाटक) में गिरफ्तार किया गया। आपातकाल के दौरान वे जेल में रहे। इस काल-खण्ड का उपयोग उन्होंने अध्ययन और रचनाधर्मिता को परिष्कृत करने में किया। इसी दौरान ‘‘कैदी कविराय की कुण्डलियां’’ लिखी। जेल में रहते हुए अटल जी ने कई लेख लिखे और रचनायें की जिसमें से कुछ इस पुस्तक में कविता सर्ग में पढ़ी जा सकती हैं। आपातकाल जनित जेल राजनेता अटल जी को ही कैदी बना सका, विचारक व कवि अटल जी की कल्पनाओं को कमजोर व कैद करने में असफल रहा। एक बात और 1972 का लोकसभा चुनाव अटल जी ग्वालियर से लड़े। ग्वालियर में उन्होंने बचपना बिताया था। वे ग्वालियर से निर्वाचित हुए। अटलजी, राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण से भी प्रभावित रहे। दोनों का वे बहुत सम्मान करते थे और दोनों उन्हें भी काफी स्नेह करते थे। लखनऊ और दिल्ली का काफी हाउस, संसद की गलियां, लोहियाजी व अटलजी के स्नेहासिक्त सम्बन्ध की साक्षी हैं। लोहिया 1965 में कच्छ आंदोलन के दौरान पटना से गिरफ्तार किये गये, लोहिया की गिरफ्तारी के सवाल को 7 सितम्बर 1965 को राज्यसभा में उठाते हुए अटलजी ने कहा, ‘‘आज मेरे मित्र डा0 राममनोहर लोहिया जेल में रहंे, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। वे देशभक्त हैं, जेल से बाहर निकलेंगे तो जनता को युद्ध जीतने के लिए प्रेरित करेंगे।’’ इसी पवित्र व समर्पण भाव से अटलजी, लोहिया जी के बाद लोकनायक जयप्रकाश के साथ रहे। जनता पार्टी में जनसंघ के विलय के तमाम परिस्थितिजन्य कारणों के अलावा एक कारण जेपी के प्रति अटल जी का अनिर्वचनीय सम्मानभाव भी था। आपातकाल में अटल हर मोर्चे पर लड़े। अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने लड़ाई में कोताही नहीं बरती। जेल में अटल जी खुद खाना बनाते और सबको खिलाते थे। खाना बनाना उनका प्रिय शौक सदैव रहा। लोकसभा द्वारा प्रकाशित ‘हू’ज हू’ में अटलजी की रुचियों में खाना बनाना भी उल्लिखित है। अटलजी ने आपातकाल की कठोर कारावास के दौरान ही ‘‘टूट सकते हैं मगर झुक नहीं सकते’’ कविता लिखकर अपनी मंशा व्यक्त कर दी थी। पूरी कविता इस पुस्तक में पृष्ठ संख्या 84 पर प्रकाशित है। यहाँ कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना चाहूॅगा -

‘‘किन्तु फिर भी जूझने का प्रण, पुनः अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-प्रण से करेंगे प्रतिकार, समर्पण की माँग अस्वीकार।
दांव पर सब कुछ लगा है रुक नहीं सकते,
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।’’

अटल जी ने टूटना स्वीकार किया लेकिन झुके नहीं। आपातकाल की काली स्याह रात कटी। लोकतंत्र का सवेरा मुस्कुराया। आपातकाल आधिकारिक रूप से 23 मार्च 1977 के दिन समाप्त हो गया। मार्च 23, ऐतिहासिक तिथि है। इस दिन भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को 1931 में फांसी हुई थी। इसी दिन 1910 में राममनोहर लोहिया का जन्म हुआ था और इसी दिन आपातकाल हटने से इस तिथि की महत्ता व ऐतिहासिकता कई गुणा बढ़ गई। आपातकाल के बाद विपक्ष की सभी महत्वपूर्ण पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया। जनता पार्टी के निर्माण की घोषणा लोकनायक जयप्रकाश ने की। इसकी अट्ठाइस सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति में मोरारजी देसाई अध्यक्ष, चौधरी चरण सिंह उपाध्यक्ष और सर्वश्री मधु लिमए, रामधन, सुरेन्द्र और लालकृष्ण आडवाणी महासचिव बने। लालकृष्ण आडवाणी जी को छोड़कर सभी विभूतियां आज सशरीर नहीं है। ईश्वर, आडवाणी जी को दीर्घायु करें। उनका मार्गदर्शन हम सभी को यथावत मिलता रहे। छठीं लोकसभा हेतु चुनाव के लिए 10 फरवरी 1977 को अधिसूचना जारी हुई। चुनाव में मुकाबला मुख्यतः कांग्रेस (इंदिरा) और जनता पार्टी के मध्य हुआ। जनता का आशीर्वाद जनता पार्टी को मिला। जनता पार्टी को 295 सीटें और 41. 32 फीसदी वोट मिले। इन 295 सीटों में 93 सांसद पूर्ववर्ती जनसंघ, 71 सीटें चरण सिंह वाली लोकदल और मोरारजी देसाई वाली कांग्रेस (संगठन) की 44 सीटें थी। बाकी सदस्यों की सम्बद्धता सोशलिस्ट पार्टी व बाबू जगजीवन वाली पार्टी से थी। सर्वाधिक सांसद होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयीजी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी के रेस से लोकनायक जयप्रकाश नारायण, आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी व विजयलक्ष्मी पंडित की तरह खुद को परे रखा। मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री और चौधरी चरण सिंह उप प्रधानमंत्री बने। जनसंघ के कोटे से अटल जी विदेश मंत्री, लालकृष्ण आडवाणी जी सूचना एवं प्रसारण मंत्री तथा श्री बृजलाल वर्मा को उद्योग मंत्री बनाया गया। अटलजी छठी लोकसभा (1977) का चुनाव नई दिल्ली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से जीते। बतौर विदेश मंत्री अटलजी का कार्यकाल शानदार और स्वर्णाक्षरों में लिखने वाला रहा। उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की साख व स्वीकार्यता बढ़ाई। भारत के प्रतिनिधि के रूप में अटलजी ने 4 अक्टूबर 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में संभाषण देकर पूरी दुनिया में बसे भारतवासियों का मान बढ़ा दिया। सभी भारतीय भाषाओं विशेषकर हिन्दी बोलने वालों को अटल जी से आकाशचुम्बी गौरवबोध प्राप्त हुआ।

इस भाषण के माध्यम से अटलजी ने पूरी दुनिया को भारतीय मेधा व मनीषा से परिचित कराया और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की बात की। उन्होंने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में व्याप्त विषमता को बड़ी शालीनता से रेखांकित करते हुए मानवता के सम्मुख समुपस्थित समस्याओं के समाधान की बात एक ऋषि की भाँति की। अमरीका के बुद्विजीवियों को स्वामी विवेकानन्द की याद दिला दी। संयुक्त राष्ट्र संघ के 32वें अधिवेशन में दिया गया अटलजी का यह कालजयी क्रांतिधर्मी उद्बोधन इस पुस्तक में पृष्ठ 66 से 78 के मध्य में प्रकाशित है। मेरा आग्रह है इसे जरूर पढ़ें और मनन करें। देश की परराष्ट्र नीति का यह भाषण एक संग्रहणीय दस्तावेज है। केन्द्र की तरह उत्तर प्रदेश में भी जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली। रामनरेश यादव जी के मुख्यमंत्रित्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत, मध्य प्रदेश में कैलाश चन्द्र जोशी, हिमाचल में शांता कुमार जी सदृश जनसंघ की पृष्ठभूमि से आए महनीय नेतागण मुख्यमंत्री बनें। श्यामाप्रसाद जी और दीनदयाल जी के समय का संकल्प मूर्तरूप ले रहा था। अटलजी इन सार्थक परिवर्तनों को लेकर काफी संवेदनशील थे किन्तु जनता पार्टी के अतर्विरोधों के कारण जनता पार्टी की सरकार गिर गई। अटल जी व जनसंघ के साथी कदापि नहीं चाहते थे कि जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति निष्फल हो। सबसे अधिक सांसदों वाली संगुटिका के एकछत्र नेता होने के बावजूद अटल जी पद के विवाद से दूर रहे। उन्हें जनता पार्टी के विघटन से काफी आघात पहुँचा। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए कविता लिखी जो ‘‘सपना टूट गया’’ शीर्षक से प्रकाशित हुई।

दीप बुझाया रची दिवाली, लेकिन कटी न मावस काली
व्यर्थ हुआ आवाहन, स्वर्ण सवेरा रूठ गया।
पलक झपकने से पहले ही सपना टूट गया।’’

इन पंक्तियों से हम अटलजी की मनःस्थिति को समझ सकते हैं। पूरी कविता पृष्ठ संख्या 95 पर पढ़ी जा सकती। अटल जी अरण्यरुदन करने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके टीम जुझारू और सिद्धांतनिष्ठ थी, पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निस्वार्थ सेनानी थे। अटल जी ने अपनी पहचान व जिजीविषा के अनुरूप आगे कदम बढ़ाया। उन्होंने अपनी ‘‘पहचान’’ शीर्षक वाली कविता में लिखा है -

जड़ता नाम जीवन नहीं है, पलायन पुरोगमन नहीं है,
आदमी को चाहिए कि वह जूझे, परिस्थितियों से लड़े,
एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

मुझे व्यक्तिगत रूप से यह कविता काफी पसंद है जब सुनता हूँ तो यह मुझे सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। जब कभी स्वयं को ऊहापोह में पाता, यह पंक्तियां दोहराता हूँ तो संघर्ष की प्रेरणा से अन्तर्मन को ओत-प्रोत पाता हूँ।’’ जनता पार्टी का स्वप्न टूटा, तो अटलजी ने भारतीय जनता पार्टी के संकल्प के साथ नई सृजन यात्रा की तैयारी कर ली। सातवंीं लोकसभा के लिए मतदान जनवरी 1980 में हुए। श्रीमती इंदिरा गाँधी दोबारा बहुमत से चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनीं। अटल जी नई दिल्ली से पुनः निर्वाचित हुए। अटलजी जनता पार्टी और जयप्रकाश नारायण के संकल्प को पूरा करना चाहते थे और नया विकल्प देने के लिए प्रण-प्राण से प्रतिबद्ध थे। अप्रैल की पांच और छह (5-6) तारीख को 1980 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में साढ़े तीन हजार से अधिक राष्ट्रवादी प्रतिनिधियों की उपस्थिति में अधिवेशन हुआ। व्यापक मनन-चिन्तन के बाद 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी के गठन का फैसला लिया गया। कोटला मैदान में मंच पर लगे बैनर में तीन महापुरुषों की तस्वीरें थीं। पहली जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी, दूसरी एकात्म मानवदर्शन के विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय और तीसरी तस्वीर लोकनायक जयप्रकाश नारायण की थी। आंग्ल भाषा में एक कहावत जिसका फ्रेड आर0 बर्नार्ड बार-बार उल्लेख करते थे कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है (A picture is worth a thousand words) तीनों तस्वीरों से स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी व पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ-साथ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के भी विरासत की पार्टी होगी। मैं वाणिज्य व गणित का विद्यार्थी रहा हूँ। यदि गणितीय सूत्र में भाजपा को बतलाना हो तो कहँूगा-

भारतीय जनसंघ + जनता पार्टी = भारतीय जनता पार्टी।

भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में सिर्फ एक नाम सबके मस्तिष्क और हृदय में था, वह था कविवर कुलश्रेष्ठ कर्मठता व कटिबद्धता की मिसाल अटल बिहारी वाजपेयी जी। श्री सिकंदर बख़्त, सूरजभान जी के साथ लालकृष्ण आडवाणी जी संस्थापक महासचिव बने। अटलजी ने स्पष्ट किया कि हम अपनी मूल विचारधारा और सिद्धांतों के आधार पर आगे बढेंगे। अटलजी ने पार्टी के ध्येय के रूप में एकात्म मानववाद की धारणा के साथ गांधीवादी समाजवाद को जोड़ा। उनके अनुसार भारतीय समाजवाद, समाजवाद की मार्क्सवादी धारणा से बिल्कुल अलग है। अटलजी द्वारा भाजपा का जो संविधान बनाया और पारित किया गया उसकी शुरू की 5 धाराओं (उपबन्धों) का उल्लेख करना चाहूँगा जो हमारे भाजपा के हर युवा साथी को आत्मसात् करना चाहिए, जो हम सभी का पाथेय है।

धारा 1- (नाम) पार्टी का नाम भारतीय जनता पार्टी होगा।

धारा 2- (उद्देश्य) - पार्टी एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए प्रतिज्ञाबद्ध है जो सुदृढ़, समृद्ध एवं स्वावलम्बी राष्ट्र हो, जिसका दृष्टिकोण आधुनिक, प्रगतिशील व प्रबुद्ध हो और जो अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों से सगर्व प्रेरणा ग्रहण करता हो तथा एक ऐसी महान शक्ति के रूप में उभरने में समर्थ हो, जो विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों में अपनी प्रभावशाली भूमिका का निर्वहन कर सके। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे लोकतंत्रीय राज्य की स्थापना करना है जिसमें जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंग का भेद-भाव किये बिना सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय समान अवसर तथा धार्मिक विश्वास एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके। पार्टी विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान तथा समाजवाद, पंथ निरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा रखेगी तथा भारत की प्रभुसत्ता, एकता और अखण्डता कायम रखेगी।

धारा-3 (मूल दर्शन)-एकात्म मानवाद पार्टी का मूल दर्शन होगा।

धारा-4 (निष्ठायें) राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकात्मता, लोकतत्र, सामाजिक-आर्थिक विषयों पर गांधीवादी दृष्टिकोण जिससे शोषणमुक्त एवं समतायुक्त समाज की स्थापना हो सके, सकारात्मक पंथ निरपेक्षता अर्थात् सर्वधर्म समभाव मूल्यों पर आधारित राजनीति और आर्थिक एवं राजनीतिक विकेन्द्रीकरण में पार्टी विश्वास करेगी। बंबई में 28-30 दिसम्बर 1980 की तिथियों में भाजपा का पहला तीन दिवसीय महाधिवेशन हुआ। इसमें लगभग 50 हजार प्रतिनिधि पूरे देश से पहुॅचे। बांद्रा में जिस स्थान पर अधिवेशन हुआ, उसे ‘समता नगर’ का नाम दिया गया। अध्यक्षीय उद्बोधन में अटल ने कहा, ‘‘जहाँ तक हमारा सवाल है, हम लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के लिए अनवरत् संघर्षरत हैं। एक हाथ में भारत का संविधान और दूसरे हाथ में समता का परचम लेकर आइये। हम संघर्ष के लिए कमर कसें। अँधेरा छँटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा। ‘बंबई अधिवेशन’ में सबसे महत्वपूर्ण मोहम्मद करीम छागला की उपस्थिति थी। पंडित नेहरू सरकार में शिक्षा मंत्री रहे छागला बंबई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय के भी तदर्थ न्यायाधीश रह चुके थे। उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था। छागला ने अपने अनुभव के आधार पर घोषणा की कि भाजपा ही कांग्रेस का विकल्प बनेगी और एक दिन जरूर अटल बिहारी वाजपेयी देश के एक प्रधानमंत्री बनेंगे। दोनों बातें कालान्तर में सही सिद्ध र्हुइं पर यह देखने के लिए छागला जी जीवित नहीं रहे। भाजपा ने 1985 में कर्नाटक विधान सभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर पहली बार दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 25 जून 1980 को इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी और 31 अक्टूबर 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री आवास में ही गोली मारकर हत्या हो गई। कांग्रेस ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री घोषित कर चुनाव लड़ा। भारत की जनता बहुत भावुक है। सहानुभूति की लहर में आठवीं लोकसभा का चुनाव हुआ। कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी जीत मिली। इस चुनाव में अटल जी को भी ग्वालियर लोकसभा से हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के सिर्फ दो प्रत्याशी जीते। भाजपा को 7.74 प्रतिशत वोट मिले जो पूर्ववर्ती जनसंघ द्वारा 1971 के लोकसभा चुनाव में प्राप्त 7.35 फीसदी से अधिक थे। अटल जी समेत भाजपा के सेनानियों में नैराश्य का भाव आना स्वाभाविक था। श्रम के अनुरूप परिणाम न आने पर दुःखी व उदास होना मानवीय स्वभाव है। अपने 61वें जन्मदिन पर 25 दिसम्बर 1985 को अटल जी ने लिखा कि-

बदला मौसम, ढलती छाया, रिसती गागर, लुटती माया
सब कुछ दाँव लगाकर घाटे का व्यापार हुआ,
नये मील का पत्थर पार हुआ।।

महाकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की परम्परा के कवि अटल जी दिनकर (सूर्य) की भाँति स्याह रात से लड़कर सवेरा लाना जानते थे। तात्कालिक नैराश्य के भाव को जमीन पर पटकते हुए उन्होंने नये तेवर में लोक संघर्ष की शुरूआत

‘‘बाधाएँ आती हैं, आएँ, घिरे प्रलय की घोर घटाएँ,
उजियार में, अंधकार में, कल कछार में, बीच धार में,
नीरवता से मुखरित मधुवन, पर-हित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन के शत-शत आहुति में जलना होगा, गलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा।

अटलजी के लिए राजनीति, स्वहित के लिए किया गया व्यापार नहीं परमार्थ की साधन थी। वे राजनीति लोकसेवा के साधक की भाँति करते रहे। स्वतंत्र पार्टी जैसे कई दल जहाँ विलुप्त हो गये, लेकिन अटलनीत भाजपा पूरी प्रण-प्राण से मैदान में रही। उन्होंने अध्यक्ष के रूप में दो कार्यकाल पूरा करने के बाद अपना दायित्व लालकृष्ण आडवाणी जी को सौंप दिया। पार्टी को पता था कि अटलजी का संसद में होना देश व दलहित में नितांत आवश्यक है, इसलिए उन्हें 1986 में मध्य प्रदेश से राज्य सभा के लिए निर्वाचित किया गया। अटल जी अपनी प्रतिभा व चमत्कृत कर देने वाली भाषण कला से सरकार को घेरते और ‘‘एकश्चंद्र तमो हन्ति न च सहस्र तारकः’’ की उक्ति को राज्य सभा में अपने जीवन की भाँति चरितार्थ करते रहे। 1984 में प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी की ‘मिस्टर क्लीन’ वाली छवि समय के साथ टूटती रही, नौंवी लोकसभा के चुनाव के दौरान 1989 में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह बोफोर्स घोटाला जैसे मुद्दे उठाकर एक ईमानदार नेता के रूप में स्वंय को स्थापित किया। इस चुनाव में ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’, का नारा खूब चला। लगा कि दो पाटन के बीच भाजपा फिर पिस जायेगी, पर यह अटलजी की अटल इरादे वाली भाजपा है। भाजपा 11.36 प्रतिशत वोट पाकर 85 सीटें जीती। भाजपा ने अपनी घोर वैचारिक वैरी व प्रतिवैरी दोनों कम्युनिस्ट दलों को मीलों पीछे छोड़ दिया। राजनीति के जानकार अचम्भित थे। मुझे उन दिनों की याद है, मैं लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि की पढ़ाई कर रहा था। राजनीतिक अभिरुचि शुरू से ही थी। विधि संकाय का प्रतिनिधि 1986-87 में चुन लिया गया था। वह दौर राजनीतिक अस्थिरता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह जी सरकार भाजपा के बाहरी समर्थन से चल रही थी। अविश्वास बढ़ता जा रहा था। 12 सितम्बर 1990 को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री आडवाणी ने 25 सितम्बर 1990 से राममंदिर के लिए रथ-यात्रा करने की घोषणा की। आडवाणी जी ने 25 सितम्बर को सोमनाथ मंदिर में वर्तमान प्रधानमंत्री हम सभी के गौरव-पुरुष नरेन्द्र दामोदर दास मोदी, श्री प्रमोद महाजन व परिजनों के साथ शिव की पूजा कर संकल्प के साथ यात्रा प्रारम्भ की। पार्टी के दो उपाध्यक्ष श्रीमती विजय राजे सिंधिया व सिकन्दर बख्त जी यात्रा प्रारम्भ कराने पहुॅचे थे। यात्रा से पहले 17 अक्टूबर 1990 को ही भाजपा राममंदिर के निर्माण की माँग कर चुकी थी। माँग मानने के उलट 23 अक्टूबर 1990 को आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। अटलजी के सामने सरकार को समर्थन देते रहने और सिद्धांत के लिए समर्थन वापस ले पुनः विपक्ष में आने का प्रश्न आया। बेहिचक बिना समय गंवाए 23 अक्टूबर 1990 को समर्थन वापसी का पत्र राष्ट्रपति आर0 वंेकटरमण को सौंप दिया। श्री वी0पी0 सिंह सरकार गिर गई। चन्द्रशेखर जी ने कांग्रेस की मदद व समर्थन से सरकार बना ली। मैं भी तब तक लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष निर्वाचित हो चुका था। राजनीतिक कार्यकर्ता होने के कारण देश में घटित हो रही घटनाओं पर हम सभी की दृष्टि लगी रहती थी। मैंने भी राजनीति के माध्यम से देश सेवा करने की धारणा बना ली थी। चन्द्रशेखर सरकार अभी ठीक से स्थापित भी नहीं हुई थी कि कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर गिरा दिया। देश के सामने अल्पावधि में लोकसभा का आम चुनाव आ गया। दसवीं लोकसभा (1991) की चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही 21 मई 1991 को राजीव गांधी जी की हत्या मद्रास (चेन्नई) के निकट कर दी गयी। सहानुभूति का लाभ एक बार फिर कांग्रेस को मिला। कांग्रेस ने 232 सीटें जीतकर सरकार बनाई। अटलजी का राज्यसभा में कार्यकाल बाकी था फिर भी उन्हंे लोकसभा लड़ाने का फैसला लिया गया। उन्होंने दसवीं लोकसभा के लिए लखनऊ निर्वाचन क्षेत्र चुना। यहाँ का चुनावी इतिहास जनसंघ व भाजपा के लिए प्रतिकूल था। 1989 में यहाँ से प्रो0 बलराज मधोक लड़े थे जिन्हें जनता दल के श्री मान्धाता सिंह व कांग्रेस के दाऊजी गुप्त से भी कम वोट मिले थे। लखनऊ में अभी तक जनसंघ व भाजपा से कोई जीत के करीब तक नहीं पहुँचा था। लखनऊ पर फिर भी अटलजी ने असीम विश्वास दिखाया और लखनऊ ने भी अटलजी पर उनसे अधिक विश्वास किया। हम लोग अटलजी का भाषण सुनने पैदल जाते थे। उनके भाषणों को सुनने का जुनून सवार था। वे मंत्र-मुग्ध कर देते थे। सभी प्रत्याशियों को प्राप्त मत से अधिक अटलजी को अकेले वोट मिले। विद्यार्थी, युवा, बुद्धिजीवी सभी अटलजी जैसा नेता पाकर मुदित थे। मैं भी अक्सर विद्यार्थियों की टोली लेकर लाप्लास कालोनी पहुँच जाता जहाँ अटलजी ठहरते थे। अटलजी के लखनऊ आने का प्रभाव पूरे उत्तर प्रदेश पर पड़ा। उत्तर प्रदेश की एकादश विधान सभा चुनाव (1991) मंे पहली बार भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। कल्याण सिंह जी सूबे के मुख्यमंत्री बने। सबसे बड़ी आबादी वाले प्रांत में भाजपा की सरकार बन गई। मुझे याद है कि कल्याण सिंह जी की सरकार में राजा महेन्द्र अरिदमन सिंह को शपथ लेना था किन्तु कतिपय कारण से वे लखनऊ नहीं पहुँच सके। उसी रात वे अटल जी के पास मिलने आये और माननीय मुख्यमंत्री जी से कहकर शपथ ग्रहण कराने को कहा। अटल जी ने उनकी बात सुनी, फिर आंख बंद कर कुछ मनन करने लगे। मैं भी वहाँ बैठा हुआ था, मुझे लगा कि अटल जी बैठे-बैठे सो गये हैं। दरअसल वे ऋषि की भाँति मन ही मन मंथन करते थे। अचानक आंख खोले और बड़ी सहजता से बोले-‘‘टेªन तो छूट गई।’’ अटल जी अक्सर बातें संकेतों में या लक्षणा में कहते थे। हम लोगों को लगा कि अटल जी पैरवी नहीं करेंगे। अकस्मात् उन्होंने फिर आंख खोली और छाया की भाँति साथ रहने वाले निजी सचिव व सहयोगी शिवकुमार पारिख से कल्याण सिंह जी से फोन से बात कराने को कहा और राजा साहब को शपथ दिलाने का निर्देश दिया। वे फोन के बाद एक शब्द भी एहसान जताने वाला नहीं बोले। उस दिन उन्होंने गुरु की भांति मुझे जरूर एक सीख दी कि अनावश्यक भीड़ लेकर चलना आवश्यक नहीं। उनके समक्ष बैठने या उनसे बात करते समय लगता ही नहीं था कि हम लोग राजनीति के शिखर पुरुष के साथ हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि अपने अभिभावक के रूब-रू हैं जिनके दिन प्रतिदिन के सरोकार हैं। वे आम और विशिष्ट का भेद नहीं करते थे। उनके निकट आने वाला आम व्यक्ति या कार्यकर्ता भी उनके पास में ‘‘विशिष्ट’’ होने का मनोबल व भाव लेकर उठता था। इसका एक उदाहरण मैं अपने आपको खुद मानता हूँ। उनके इसी चुम्बकीय गुण के कारण शिवकुमार जी उनसे जुड़े और उन्हीं के होकर रह गये। बतौर कुछ दिन अटल जी, 1 फिरोजशाह रोड पर रहे। पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से विशेष लगाव था। अटल जी का प्रकृति प्रेम जगजाहिर है। फिरोजशाह रोड स्थित आवास में उन्होंने एक खरगोश पाला था। शाम को लौटने के बाद खरगोश को हरी घास खिलाते और कुछ पल उसके साथ खेलते थे। एक दिन अचानक खरगोश का देहांत हो गया। अटलजी ने परिजन की भाँति उसका अन्तिम संस्कार किया और दो-तीन दिनों तक बेचैन रहे। उनका कवि मन सदैव करुणा से ओत-प्रोत रहता था। देश में अटलजी को लेकर आकर्षण बढ़ता जा रहा था। विद्याग्रही नरसिंह ने अटलजी को देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।

पद्म विभूषण’ अटलजी के लिए 24 अप्रैल 1992 को दिल्ली में अभिनन्दन समारोह रखा गया। इसमें अटलजी ने ‘‘ऊँचाई’’ शीर्षक से कविता पढ़ी जो उन्हें कवि, राजनेता के अलावा दार्शनिक दर्शाती है। इस कविता को पृष्ठ क्रमांक 83 पर पढ़ा जा सकता है, लेकिन कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना संदर्भवश समीचीन होगा-

ऊँचे पहाड़ पर पेड़ नहीं लगते ,पौधे नहीं उगते , न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ, जो कफन की तरह
सफेद और मौत की तरह ठंडी होती है।’’
धरती को बौनों की नहीं, ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना।
गैरों को गले न लगा सकूॅ, इतनी रुखाई कभी मत देना।

अटलजी के अनन्य सहयोगी आडवाणी जी 1993 में दोबारा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उन्हें पता था कि लोकसभा में अटल जी के अलावा कोई सरकार पर भारी नहीं पड़ सकता क्योंकि नरसिंह राव स्वयं बहुत पढ़े-लिखे विद्वान व्यक्ति थे। भाजपा ने अटल जी को लोकसभा में अपना नेता चुना। अटल जी स्वाभाविक नेता थे ही लेकिन अब अधिकृत भी हो गये। 21 जुलाई 1993 से लेकर 15 मई 1996 तक अटलजी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। नेता प्रतिपक्ष के रूप में अटलजी भाषणों के द्वारा सरकार को दर्पण दिखाते रहे। उनकी आलोचनाएँ जितनी कठोर व तार्किक होती थी लहजा उतना ही मृदुल होता था। दसवीं लोकसभा में ही प्रतीत होने लगा था कि देश के अगले प्रधानमंत्री अटलजी ही होंगे। अटलजी ने अपने को हमेशा सर्व-समावेशी बनाये रखा। पद की विकृतियाँ उन्हंे छू नहीं सकीं। मुम्बई में 1995 में भारतीय जनता पार्टी महाधिवेशन 8-9 नवम्बर को हुआ। जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं की धड़कनों की आवाज़ सुनते और व्यक्त करते हुए अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि यदि भाजपा की सरकार आयेगी तो अटल जी ही प्रधानमंत्री होंगे। वे जानते थे कि अटल जी तुलना में देश में कोई इतना प्रभावशाली, मोहक, निर्विवाद और जिताऊ चेहरा नहीं है। ग्यारहवीं लोकसभा के चुनावों की तिथि 27 मार्च 1996 को घोषित हुई। कई चरणों में लोकसभा चुनाव हुए। इस आम चुनाव भाजपा को 161 सीटें और कांग्रेस को 140 सीटें मिली। सबसे बड़े दल के नेता के कारण अटल जी को प्रधानमंत्री पद हेतु शपथ के लिए राष्ट्रपति महोदय द्वारा आमंत्रित किया गया। अटल जी मात्र 13 दिन प्रधानमंत्री रहे। अटलजी के बाद श्री देवेगौड़ा फिर श्री इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री बने। ग्यारहवीं लोकसभा अपना 5 वर्ष का अंतराल पूरा नहीं कर सकी। अटल जी चाहते तो अल्पमत की सरकार को ‘‘अन्य’’ तरीकों से बचा सकते थे किन्तु उन्होंने सिद्धांत का पथ नहीं छोड़ा। लोकसभा के प्रतिपक्ष के नेता के रूप में अटल जी सरकार पर भारी पड़ते थे। जनता के मन में यह बात बैठ गयी कि अटल जी ही देश को चला सकते हैं। उनका प्रधानमंत्री बनना ही उचित होगा। बारहवीं लोकसभा हेतु चुनाव फरवरी मार्च 1998 में हुए। भाजपा के 182 प्रत्याशियों को जीत मिली। अटलजी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने पहली बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया। बतौर प्रधानमंत्री लाल किले से किया गया उनका संबोधन श्रेष्ठ व प्रेरक भाषणों में एक है, जिसे पृष्ठ 49 के बाद के पन्नों पर साथी गण पढ़ सकते हैं।

लाल किले से अटल जी ने आजादी की रक्षा का संकल्प लिया और घोषणा की कि भले ही इनके लिए सर्वस्व त्याग क्यों न करना पड़े, कदम पीछे नहीं हटायेंगे। इस भाषण में उन्होंने जातिवाद, भ्रष्टाचार को चुनौती दी और कहा कि सरकार में होने के बावजूद संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ेंगे। अटलजी ने 11 मई 1998 को पोखरण परमाणु परीक्षण करवाया। देश को परमाणु शक्ति बनाया, किन्तु यह परीक्षण आत्मरक्षा व शांति के लिए है, यह संदेश देने के लिए उन्होंने इस अभियान का कूट-नाम ‘‘बुद्ध मुस्कराये’’ रखा। इसी दिन अटलजी सफदरजंग रोड पर स्थित अपने निवास से प्रधानमंत्री आवास (7 रेसकोर्स मार्ग, नई दिल्ली) पहुॅचे। अटलजी ने दुनिया के शक्तिशाली देशों और उनकी प्रतिक्रियाओं व प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए परमाणु परीक्षण किया था, फलस्वरूप इससे भारत के अन्दर और बाहर रहने वाले देशभक्तों के हृदय में असीम प्रसन्नता एवं गर्व की भावना आप्लावित होने लगी। अटलजी ने परीक्षणों को ‘‘आपरेशन शक्ति‘‘ की संज्ञा इसलिए भी दी क्योंकि उन्हें भारत की शक्ति का बोध पूरे विश्व को करवाना था जिसमें वे पूर्णतया सफल रहे। परमाणु-परीक्षण के बाद ही अटलजी ने ‘हिरोशिमा’ लिखकर स्पष्ट किया कि वे अनावश्यक युद्ध के समर्थक नहीं हैं। बम का दुरुपयोग कदापि नहीं करेंगे। इसके बाद अटल जी पड़ोसी देश बस और शांति व स्नेह का संदेश लेकर गये, ठीक वैसे ही जैसे योगेश्वर कृष्ण शक्तिशाली होने के बावजूद शांति का संदेश लेकर कौरवों के पास गये थे। वैसी ही रणनीति अटलजी ने भी अपनाई। पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्ध सुधारने की उन्होंने ईमानदार कोशिश की लेकिन जब कारगिल में घुसपैठ हुआ तो युद्ध (3 मई 1999-26 जुलाई 1999) योद्धा की भाँति लड़े। भारतीय सेना को पूरा संबल दिया। अटल जी युद्ध के समय कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे। 14 अप्रैल 1999 को एआईएडीएमके ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। अटलजी ने जोड़-तोड़ और प्रपंच से सरकार बनाने की जगह एक बार फिर चुनाव में जाना बेहतर समझा। उन्हें अपने साथियों और अपनी नीतियों पर विश्वास था। तेरहवीं लोकसभा का चुनाव पांच चरणों में हुआ। 5 सितम्बर 1999 को 146 निर्वाचन क्षेत्रों, दूसरे चरण मंे 11 सितम्बर 1999 को 123 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों, तीसरे चरण में 18 सितम्बर 1999 को 79 निर्वाचन क्षेत्रों में, चौथे चरण में 74 और पंाचवें चरण में 3 अक्टूबर 1999 को शेष चुनाव क्षेत्रों में मतदान हुआ। यह चुनाव पूरी तरह अटल बिहारी वाजपेयी जी के इर्द-गिर्द था। उस दौरान हम लोग जो नारे सुनते थे, सभी कमोबेश अटलजी के ही नाम के इर्द-गिर्द होते थे। सुनकर अच्छा लगता था कि जिस विभूति से हमारा परिचय है, जिनका मुझे स्नेह व आशीर्वाद मिलता है, उसके नाम की अनुगूंज पूरे देश में हो रही है। युवा मन का उत्साह कहिए या अनुभव की कमी, मैं अपने आपको वहाँ के छात्र संघ का अध्यक्ष बताता था, जहां के सांसद अटलजी हैं। हर व्यक्ति अटल जी के महान व गरिमायुक्त नाम से अपना नाम जोड़ना चाहता था तो मैं क्यों ं पीछे रहता? ‘‘योग्य प्रधानम त्री-स्थिर सरकार’’ एबल प्राइममिनिस्टर- सूटेबल गवर्नमेन्ट’’ ‘‘स्थिर सरकार-कुशल कर्णधार’’। जन-जन की है यही पुकार केन्द्र में हो भाजपा सरकार। ‘भ्रष्टाचार मिटाना है भाजपा को जिताना है। ‘देश को दिशा दीजिए-इतिहास बदल दीजिए, रामराज्य की ओर चलें-भाजपा के साथ चलें’ जैसे नारे भाजपा के साथियों द्वारा खूब लगाये जाते थे। अटलजी ही भाजपा और राजग के कर्णधार व चेहरे थे इसलिए भाजपा की जगह अटल या अटल बिहारी ;31द्ध अतुलनीय अटलजी वाजपेयी का नाम भी उसी उत्साह से लिया जाता था। निःसंदेह भाजपा व अटल एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द थे, हैं और सदैव रहेंगे। ‘‘सब पर भारी अटल बिहारी’’ अटल अटल हैं, अटल रहेंगे।’’ ‘‘अबकी बारी-अटल बिहारी’’, ‘‘भारतीय बनिये-भारतीय चुनिये’’, ‘‘देश धर्म से नाता है-परमाणु बम चलाना आता है’’, भाजपा के ब्रह्मास्त्र अटलजी ही थे, यहाँ तक रायबरेली में भी नारा बुलन्द हो गया ‘‘नहीं चाहिए गगन बिहारी-हमें चाहिए अटल बिहारी।’’ चुनाव परिणाम 6 अक्टूबर 1999 को आये, भाजपा को 182 सीटें मिली और कांग्रेस के 114 प्रत्याशी ही जीत पाये। अटल जी तीसरी बार और लगातार दूसरी बार जीतकर प्रधानमंत्री बने। आजाद हिन्दुस्तान में लगातार दो चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनने का करिश्मा व रिकार्ड पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल जी के ही नाम दर्ज है। इंदिरा जी जरूर तीन बार प्रधानमंत्री बनीं पर लगातार वो भी नहीं जीती हैं। श्रीमती गांधी 1977 में प्रधानमंत्री रहते हुए जनता पार्टी से हारी थीं। अटल जी ने भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जनता की पार्टी के रूप में स्थापित कर दिया। वे पंडित नेहरू का लगातार तीन बार प्रधानमंत्री बनने का रिकार्ड स्वास्थ्य कारणों से नहीं तोड़ सके, जिसे उनके ही शिष्य और योग्यतम उत्तराधिकारी श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी ने तोड़ा। प्रधानमंत्री के रूप में अटल जीने यह कार्यकाल पूरा किया। वे निष्कलंक रहे। कबीर की तरह ‘ज्यों के त्यों धर दीन्हीं चदरिया’’। सत्ता के बावजूद अपने श्वेत वसन पर कोई दाग नहीं लगने दिया। इस सदी का पहला और चौदहवीं लोकसभा का चुनाव उन्होंने फिर लखनऊ से लड़ा और जीते। इसी लोकसभा में मुझे भी पड़ोस के उन्नाव निर्वाचन क्षेत्र से जनता जनार्दन ने चुनकर भेजा। मुझे गर्व है कि अटल जी जिस 14वीं लोकसभा के सदस्य थे उसका मैं भी हिस्सा था। सर्वविदित है कि उनका आशीर्वाद मुझे 1990-91 से मिलता रहा है। जब भी सदन में मुझे देखते जरूर पास बुलाते और हाल-चाल पूछते फिर कहते ‘‘आप सब कुछ बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं। कई साथी मुझसे इसलिए भी ईर्ष्याग्रस्त रहते थे कि ‘‘ब्रजेश पाठक’’ को पूजनीय अटल बिहारी वाजपेयी का इतना स्नेह क्यों मिलता है? यह मेरा सौभाग्य है, प्रभु की कृपा है। स्वास्थ्य कारण हो या नई पीढ़ी को अवसर देने की सोच हो, जो भी अन्तर्भाव हो, अटल जी ने 2005 से स्वयं को सक्रिय राजनीति से अलग कर लिया। 2014 में अटल जी की विरासत के वाहक, उनके शिष्य व राष्ट्रवाद के सेनानी, अटल जी के कई अभियानों में साक्षी एवं सहयोगी रहे श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी की सरकार केन्द्र में ऐतिहासिक व प्रचंड जीत के साथ बनी। मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करुँगा कि श्री मोदी ने सरकार बनने के बाद अटल जी की जयन्ती 25 दिसम्बर को सुशासन दिवस मनाने के साथ-साथ महामना मदन मोहन मालवीय (दिवंगतोपरान्त) और पूज्य अटल बिहारी वाजपेयी जी को भारत रत्न से विभूषित करने की घोषणा की। हमारे गणराज्य के राष्ट्रपति महोदय श्रीमान् प्रणव मुखर्जी ने अटल जी को उनके आवास (6ए कृष्ण मेनन मार्ग, नई दिल्ली) जाकर उन्हें भारत-रत्न से विभूषित किया। महाकवि तुलसीदास के बारे में लिखा गया है, ‘‘तुलसी न लसै कविता कर के, कविता लसी पा तुलसी की कला’’ अर्थात कविता करने से तुलसी का महत्व बढ़ा हो, न बढ़ा हो लेकिन कविता की महिमा तुलसीदास की कला पाकर जरूर बढ़ गई। यही कथन किसी भी ‘‘सम्मान’’ के संदर्भ में अटलजी के परिप्रेक्ष्य में कहा जाय तो अतिरंजित कथन नहीं होगा। अटलजी देश में सुशासन चाहते थे। उनके लिए स्व-शासन व सुशासन में कोई भेद नहीं था। उनके लिए शासन-प्रशासन मात्र व साधन या पथ था जिस पर चल कर अन्तोदय, एकात्म दर्शन, रामराज्य, राष्ट्रवाद, सम्पूर्ण क्रांति, जैसी मंजिलें प्राप्त करनी थी। मोदी जी इस तथ्य को जानते हैं क्योंकि उन्होंने लम्बा समय अटल जी के सानिध्य में व्यतीत किया है तभी उन्होंने अटल जी की जयंती सुशासन दिवस के रूप में मनाने का सार्थक व सकारात्मक निर्णय लिया। श्रद्धेय लालकृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी व शांता कुमार जी के अतिरिक्त यदि आज की तिथि में अटलजी के अभियानों व जनसंघर्षो का कोई प्रामाणिक साक्षी व सहयोगी है तो वे यशस्वी राजनाथ सिंह जी हैं। उन्हें अटलजी के परिप्रेक्ष्य में इनसाइक्लोपीडिया या चलता-फिरता विश्वविद्यालय कहूँ तो गलत न होगा। वे सदैव अटलजी के अति निकट एवं विश्वसनीय रहे। अटलजी की मंशा व आशीर्वाद से ही वे जनसंघ के जिला सचिव से लेकर भाजपा के दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी शीर्ष गरिमामयी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। अटलजी जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तब उन्होंने युवा राजनाथ जी की कटिबद्धता, कर्मठता और प्रतिभा को रेखांकित करते हुए पहले भाजपा का प्रदेश सचिव और फिर भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। वे अटल जी की कैबिनेट में केन्द्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। जब अटल जी प्रंधानमंत्री व लखनऊ के सांसद थे तो राजनाथ जी 28 अक्टूबर 2002 से 08 मार्च 2002 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। आज की तिथि में आदरणीय राजनाथ जी लखनऊ से तीसरी बार सांसद हैं, जहाँ से अटल जी अनवरत पंाच बार लोकसभा सदस्य रहे। राजनाथ जी का अटलजी के प्रति सम्मानभाव का सबसे बड़ा परिचायक तथ्य यह है कि उनका कोई भी बड़ा भाषण बिना अटलजी को उद्धृत किए समाप्त नहीं होता। चाहे वह संसद में ‘आपरेशन सिन्दूर’’ पर बहस के दौरान दिया संभाषण हो या फिर भाजपा के सांगठनिक मंच से दिया गया कोई भी भाषण हो, इसका मैं स्वयं साक्षी हूँ।

बकौल राजनाथ जी, ‘‘मुझे उनसे एक अभिभावक का स्नेह और मंत्रिमंडल में सहकर्मी के रूप में काम करने का सौभाग्य मिला। अटलजी का जीवन और विचारधारा देश के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका व्यक्तित्व अद्वितीय व विराट था। उनकी कार्यशैली और निर्णयों की पूरी दुनिया कायल थी। वे भारतीय राजनीति के महान विचारक थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की प्रतिष्ठा, सेवा और विकास के लिए समर्पित कर दिया।

अपनी अध्यक्षता में भाजपा को ऐतिहासिक जीतों का सिलसिला दिलाने वाले देश के वर्तमान ’’चाणक्य’’ लौह-पुरुष श्री अमित भाई अनिलचन्द्र शाह, अटलजी द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानवदर्शन व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में गहरी आस्था रखते हैं। वे अटलजी के अनन्य प्रशंसक और सदैव उनके सपनों को मूर्त रूप देने के प्रति प्रतिबद्ध दिखते हैं और हम सभी को भी प्रेरित करते रहते हैं कि अटलजी व राष्ट्रनायकों के सपनों के अनुरूप राष्ट्र के नवनिर्माण में ईमानदारी व निष्ठाभाव से जुड़ें। वे अटलजी को भारतीय राजनीति का ‘‘धु्रव नक्षत्र’’एवं ‘‘अजातशत्रु’’ मानते हैं। हम सभी के संबल श्री अमित शाह के अनुसार, ‘‘अटल जी विचारधारा के प्रति समर्पण और मूल्य आधारित राजनीति से देश में विकास और सुशासन के नये युग की शुरूआत की। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को कार्य संस्कृति बनाने वाले वाजपेयी जी ने देश की सुरक्षा ओर जनकल्याण को सदैव सर्वोपरि माना। राजनीतिक जीवन मंे शुचिता और आत्ममंथन से उन्होंने भाजपा को जनप्रिय बनाया। अटलजी धु्रवतारे के समान अनन्तकाल तक देशवासियों को राष्ट्र सेवा के पथ पर दिशा दिखाते रहेंगे। उन्होंने अपने नेतृत्व में दुनिया को भारत के सामर्थ्य से परिचित कराया और जनता में राष्ट्र गौरव का भाव जगाया। अटलजी के महाप्रयाण के दिन आदरणीय अमित जी ने जो ब्लॉग लिखा था वो हम सभी को अवश्य पढ़ना चाहिए। इस लेख में माननीय गृह मंत्री श्री शाह ने लिखा ‘‘ अटल बिहारी इस देश की राष्ट्रीयता के प्राणतत्व थे। भारत क्या है? अगर इसे एक पंक्ति में समझना हो तो अटल बिहारी वाजपेयी का नाम ही काफी है। उनकी वाणी पर सरस्वती विराजमान थी।

अटलजी की विरासत को नवीन आयाम देने वाले माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी भी उनकी तरह ही प्रतिबद्ध राष्ट्रवादी और कवि हैं। अपने आदर्श अटल बिहारी जी को स्मरण करते हुए श्री मोदी जी एक संग्रहणीय लेख में लिखते हैं -

‘‘मैं वह दिन नहीं भूलता जब उन्होंने मुझे पास बुलाकर अंकवार में भर लिया था और जोर से पीठ में धौल जमा दी थी। वह स्नेह, वह अपनत्व, वह प्रेम, मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा है। अपनी सौम्यता, सहजता और सहृदयता से करोड़ों भारतीयों के मन में जगह बनाई। पूरा देश उनके योगदान के प्रति कृतज्ञ है। उनकी राजनीति के प्रति कृतार्थ है। वह ऐसे नेता थे, जिनका प्रभाव भी आज तक अटल है। वह भविष्य के भारत के परिकल्पना पुरुष थे। उनकी सरकार ने देश को आईटी, टेलिकम्युनिकेशन और दूरसंचार की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ाया। उनके शासन काल में ही, राजग ने टेक्नॉलजी को सामान्य मानव की पहुंच तक लाने का काम शुरू किया। भारत के दूर-दराज के इलाकों को बड़े शहरों से जोड़ने के सफल प्रयास किए गए। जब भी सर्व शिक्षा अभियान की बात होती है, तो अटल जी की सरकार का जिक्र जरूर होता है। शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मानने वाले वाजपेयी जी ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहां हर व्यक्ति को आधुनिक और गुणवत्ता वाली शिक्षा मिले। जब भी आप वाजपेयी जी के व्यक्तित्व के बारे में किसी से बात करेंगे तो वह यही कहेगा कि अटल जी लोगों को अपनी तरफ खींच लेते थे। उनकी बोलने की कला का कोई सानी नहीं था। कविताओं और शब्दों में उनका कोई जवाब नहीं था। विरोधी भी वाजपेयी जी के भाषणों के मुरीद थे। भारतीय राजनीति में वाजपेयी जी ने दिखाया, ईमानदारी और नीतिगत स्पष्टता का अर्थ क्या है।

संसद में कहा गया उनका यह वाक्य ‘‘सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए’’ आज भी मंत्र की तरह हम सबके मन में गूंजता रहता है। वह भारतीय लोकतंत्र को समझते थे। वह जानते थे कि लोकतंत्र का मजबूत रहना कितना जरूरी है। आपातकाल के समय उन्होंने दमनकारी कांग्रेस सरकार का जमकर विरोध किया, यातनाएं झेलीं। जेल जाकर भी संविधान के हित का संकल्प दोहराया। राजग की स्थापना के साथ उन्होंने गठबंधन की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया। वह अनेक दलों को साथ लाए और राजग को विकास, देश की प्रगति और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधि बनाया।

पीएम पद पर रहते हुए उन्होंने विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब हमेशा बेहतरीन तरीके से दिया। वह ज्यादातर समय विपक्ष में रहे, लेकिन नीतियों का विरोध तर्कों और शब्दों से किया। संविधान के मूल्य संरक्षण में भी, उनके जैसा कोई नहीं था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा था। वह आपातकाल के खिलाफ लड़ाई का भी बड़ा चेहरा बने। अटल जी को भारतीय संस्कृति से बहुत लगाव था। विदेश मंत्री बनने के बाद जब संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देने का अवसर आया, तो उन्होंने अपनी हिंदी से पूरे देश को खुद से जोड़ा। पहली बार किसी ने हिंदी में संयुक्त राष्ट्र में अपनी बात कही। उन्होंने भारत की विरासत को विश्व पटल पर रखा। उन्होंने सामान्य भारतीय की भाषा को संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पहुंचाया। राजनीतिक जीवन में होने के बाद भी, वह साहित्य और अभिव्यक्ति से जुड़े रहे। वह एक ऐसे कवि और लेखक थे, जिनके शब्द विपरीत स्थिति में व्यक्ति को आशा और नव-सृजन की प्रेरणा देते थे। वह हर उम्र के भारतीय के प्रिय थे। हर वर्ग के अपने थे। मेरे जैसे भारतीय जनता पार्टी के असंख्य कार्यकर्ताओं को उनसे सीखने का, उनके साथ काम करने का, उनसे संवाद करने का अवसर मिला। अगर आज भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है तो इसका श्रेय उस अटल आधार को है, जिस पर यह दृढ़ संगठन खड़ा है। उन्होंने भाजपा की नींव तब रखी, जब कांग्रेस जैसी पार्टी का विकल्प बनना आसान नहीं था। उनका नेतृत्व, उनकी राजनीतिक दक्षता, साहस और लोकतंत्र के प्रति उनके अगाध समर्पण ने भाजपा को भारत की लोकप्रिय पार्टी के रूप में प्रशस्त किया। श्री लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गजों के साथ उन्होंने पार्टी को अनेक चुनौतियों से निकालकर सफलता के सोपान तक पहुंचाया।

जब भी सत्ता और विचारधारा के बीच एक को चुनने की स्थितियां आईं, उन्होंने इस चुनाव में विचारधारा को खुले मन से चुन लिया। आइए हम सब इस अवसर पर, उनके सपनों को साकार करने के लिए मिलकर काम करें। हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जो सुशासन, एकता और गति के अटल सिद्धांतों का प्रतीक हो। मुझे विश्वास है, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के सिखाए सिद्धांत ऐसे ही, हमें भारत को नव प्रगति और समृद्धि के पथ पर प्रशस्त करने की प्रेरणा देते रहेंगे।

आज अटलजी सशरीर भले न हों किन्तु उनके अमर शब्द, उनकी शाश्वत सूक्तियां और पुण्य स्मृतियां हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी। वे दिव्य व देव पुरुष थे जो जीवन पर्यन्त देश, राष्ट्र व समाज साहित्य व संस्कृति बेहतर बनाने में स्वंय की आहुति देते रहे। अटलजी अतुलनीय थे, हैं और सदैव हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगे। अटलजी की स्मृतियों को लोक मानस में बनाये रखना हमारा लोक कर्तव्य है, वैसे ही जैसे अटलजी अपने महान पूर्वजों की स्मृतियों को लोकमानस में संजोकर रखते थे। यह पुस्तक मुझ अकिंचन की इसी पावन यज्ञ एक आहुति है।

"हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ।"

- अटल बिहारी वाजपेयी