हिन्दी भारत की राजकाज, शिक्षा दीक्षा तथा न्यायदान की भाषा बनने की लड़ाई उसी दिन हार गई जिस दिन संविधान के निर्माताओं ने 1950 में एक विदेशी भाषा को आगामी 15 वर्षों के लिए स्वतंत्र भारत की राजभाषा बनाए रखने का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय ले लिया। यदि हिन्दी को नई दिल्ली में आना था, तो वह कलम की एक ही नोक से आ सकती थी, उसे किस्तों में लाने के फैसले का विफल होना निश्चित था और वह विफलता उजागर हो गई। अंग्रेजी को क्रमशः हटाने और हिन्दी को उत्तरोत्तर बढ़ाने के फेर में अंग्रेजी साम्राज्ञी बन बैठी है और हिन्दी को चिरदासी का पद प्राप्त हो गया दिखता है। राजभाषा कानून के अन्तर्गत, यद्यपि हिन्दी प्रमुख भाषा है और अंग्रेजी इसकी सहायक भाषा, किन्तु केन्द्रीय कार्यालयों में सर्वत्र अंग्रेजी का बोलबाला है। यहाँ तक कि हिन्दी क्षेत्रों में स्थित केन्द्रीय कार्यालयों में भी जिनका सम्बन्ध वहाँ की हिन्दी-भाषी जनता से है, अंग्रेजी में काम होता है और हिन्दी का प्रयोग करने वाले कर्मचारी न केवल निरुत्साहित किये जाते हैं वरन् उन्हें किसी बहाने से दण्डित भी किया जाता है।
केन्द्रीय कर्मचारियों को हिन्दी में प्रशिक्षण देने का काम बड़े जोर शोर से जारी है। कागज पर ऐसे प्रशिक्षित कर्मचारियों के आंकड़े भी प्रभावशाली दिखाई देते हैं। किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि न केवल प्रशिक्षित कर्मचारी अपितु हिन्दी भाषा भाषी कर्मचारी भी हिन्दी भूलते जा रहे हैं। उन्हें हिन्दी में काम करने का अवसर ही उपलब्ध नहीं होता। भाषा अभ्यास से आती है। अभ्यास के अभाव में शिक्षण और प्रशिक्षण पर भी पानी फिर जाता है। हिन्दी की कितनी दयनीय स्थिति है, यह उस दिन भली भाँति पता लग गया, जब भारत-पाक समझौते की हिन्दी प्रति न तो संसद सदस्यों को और न हिन्दी पत्रकारों को उपलब्ध कराई गई। भारत-पाकिस्तान में कितना ही बुनियादी अन्तर क्यों न हो, किन्तु जहां तक अंग्रेजी की गुलामी का सवाल है दोनों देश उसका गौरव अनुभव करने में संकोच नहीं करते। जिस उर्दू का परचम (झंडा) फहराकर पाकिस्तान बना था और जिस उर्दू को बढ़ावा देने का नारा बुलन्द करके भारत के सत्ताधीश उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव को अपने पक्ष में प्रभावित करना चाहते हैं. उसके प्रतिनिधि हाल की वार्ता में न तो उर्दू में बातचीत ही कर सके और न समझौता ही कर सके। स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने जनरल अयूब को उर्दू वा हिन्दुस्तानी में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया था. किन्तु अब केवल शास्त्री जी की याद ही बाकी रह गई है। हिन्दी वालों को चाहिए कि हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी को पूरी तरह जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठित करें, केन्द्र पर दबाव डालें, जो छात्र अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा नहीं पाते हैं, उन्हें भी केन्द्रीय सेवाओं में प्रविष्ट होने का समान अवसर और अधिकार मिलना चाहिए। हिन्दी प्रदेशों को हिन्दी की समान शब्दावली का प्रयोग करने का भी समन्वित प्रयास करना चाहिए। ‘रामचरितमानस’ की चार-सौवीं वर्षगाँठ के महान् अवसर पर सभी हिन्दी भाषा भाषी राज्य, संस्थाएँ तथा व्यक्ति समूचे देश में एक ऐसी लहर फैला सकते थे, जो न केवल केन्द्र को प्रभावित करती, अपितु हर भारतीय के मानस को छू लेती। किन्तु यह समारोह हिन्दी मठाधीशों की मुट्ठी तक सीमित रह गया ।
प्रतिवर्ष एक कर्मकाण्ड की तरह हिन्दी दिवस का आयोजन और उस अवसर पर हिन्दी के पक्ष में पांडित्यपूर्ण प्रवचन के स्थान पर, हिन्दी साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, पत्रकारों तथा समर्थकों को हिन्दी को व्यवहार की भाषा बनाने के लिए एक प्रचंड राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प करना होगा। मुगलों और अंग्रेजों के राज्य में जब हिन्दी सिंहासन से कोसों दूर थी, तब भी वह पनपी, फूली-फली और न केवल समाज के लिए संजीवनी के रूप में सामने आई, अपितु राष्ट्रीय एकता का बल-माध्यम भी सिद्ध हुई। भारत के चारों कोनों में स्थित चारों धामों की यात्रा करने वाले, फिर वे केरल के हों या कश्मीर के जिस भाषा में अपने को व्यक्त करते थे और आज भी करते हैं, वह हिन्दी ही है, अन्य कोई भाषा नहीं। जब विदेशी राज्य में हिन्दी पनपी, तो अपने कहलाने वाले राज्यों में वह उपेक्षित और तिरस्कृत रहे, यह केवल हिन्दी वालों के लिए ही नहीं, स्वतंत्र लोकतंत्रवादियों के लिए भी गंभीर चुनौती है। हमें इस चुनौती को स्वीकार करना होगा और सभी भारतीय भाषाओं को शासन तथा जनता की भाषा बनाकर दिखाना होगा। श्री अन्नादुरई को तमिल भाषा का अभिमान है। उनके अभिमान की कदर करता हूँ। मगर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें भी हिन्दी भाषा का अभिमान है। हमने दिल्ली में तमिल मुर्दाबाद के नारे नहीं लगाए मगर मद्रास में हिन्दी मुर्दाबाद के नारे लगे। हिन्दी के मद्रास का क्या बिगाड़ा है? मद्रास के लोग इसके खिलाफ हो सकते है किन्तु मद्रास के लोगों को हिन्दी भाषा का विरोध नहीं करना चाहिए। में अगर दिल्ली में तमिल मुर्दाबाद का नारा लगाऊँ तो मेरे मित्र श्री अन्नादुरै को कैसा लगेगा? मगर उन्होंने हिन्दी मुर्दाबाद के नारे लगाए, हिन्दी का अपमान हुआ और वह चाहते है कि भावनाएं भड़के। तमिल समृद्ध भाषा है मगर एक क्षण के लिए भी मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि हिन्दी एक समृद्ध भाषा नहीं है। 1950 ई० में जब संविधान बना, उससे पहले मध्य भारत के उच्च न्यायालय में, हाई कोर्ट में हिन्दी में काम होता था। जयपुर व उदयपुर में अदालत की भाषा हिन्दी थी।
हिन्दी सभी प्रकार के भावों को प्रकट कर सकती है। लेकिन एक बात में पूछना चाहता हूँ कि क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या किसी भाषा का उपयोग किए बिना भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है? अगर आज अंग्रेजी समृद्ध है तो इसलिए कि अग्रेजी में राजकाज शिक्षा-दीक्षा अदालती कामकाज, संस्कार शताब्दियों से चलता आया है। और यदि हमारी भाषाएँ कुछ कम विकसित हैं तो इसलिए कि अंग्रेजी की तुलना में इनको विकसित होने का मौका नहीं दिया गया एक बार अग्रेजी हट जाय तो हमारी भाषाएँ विकसित होंगी। भाषा की प्रतिष्ठा पहले की जाती है उसका प्रचलन बाद में होता है। यदि इजरायल हिबू्र भाषा को कब्र से खोटकर खड़ा कर सकता है उसमें राजकाज चला सकता है. उस भाषा में विज्ञान के नये से नये अनुसंधान कर सकता है, तो कोई कारण नहीं है कि हम अपनी 14 भाषाओं को विकसित करके इस लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में जनता का राज न बना सकें।
(यह लेख पांचजन्य में 8 अप्रैल 1963 को प्रकाशित हुआ था।)