भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चले। राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड़-तोड़कर नहीं बनाया जा सकता। इनका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है। उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसकी संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है। इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है। जीवन की इन निष्ठाओं तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास, राष्ट्रीयत्व की भावना धनीभूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है। उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की, पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है।

भारत एक प्राचीन राष्ट्र है। स्वतन्त्रता की प्राप्ति से, इसके चिरकालीन इतिहास में एक नये अध्याय का प्रारम्भ हुआ। किसी नवीन राष्ट्र का जन्म नहीं। नया राष्ट्र बनाने की चर्चा का परिणाम जीवन-मूल्यों की अवहेलना और आत्म-विस्मृति में हुआ है। फलतः हमारे राष्ट्रीय मानस में एक गाँठ पड़ गई है और द्वैत भाव की सृष्टि हुई है। घर और बाहर के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के अलग-अलग आदर्श बन गए हैं। भारत के ऋषियों-महर्षियों, स्मृतिकारों, पुराण-निर्माताओं, साधु संन्यासियों, कवि-कलाकारों, सम्राटों-सेनापतियों और सन्तों तथा सुधारकों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है। जिन उपादानों ने हमें हजारों साल तक एक बनाये रखा, जिनके कारण हम बाहरी आक्रमण और आन्तरिक विघटन के बावजूद अपने अस्तित्व को कायम रख सके, उन्हें आज तिरस्कृत किया जा रहा है। यह एकता की प्राप्ति का नहीं, बची-खुची एकता को भी खतरे में डालने का मार्ग है। आवश्यकता है कि हम अपने राष्ट्र की प्राचीनता को मान्य करें और उसके सही स्वरूप को समझें। भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक है। सांस्कृतिक एकता की अनुभूति ही राजनीतिक एकता के पक्ष की प्रेरक शक्ति रही है। राजनीतिक एकता के अभाव ने देश की सांस्कृतिक धारा को कभी खण्डित नहीं होने दिया। जहाँ एक ओर हम भारत की संस्कृति से अभिन्न रूप से सम्बद्ध अनेक राजनीतिक इकाइयों के प्रति उदासीन तथा सहिष्णु रहे हैं, वहाँ दूसरी ओर भारतीय संस्कृति से भिन्न उसके विकृत अथवा विरोधी भाव पर आधारित, कोई भी राजनीतिक सत्ता हमें मान्य नहीं हुई। हम सदैव उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं।

विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। हमने एकरूपता की नहीं, अपितु एकता की कामना की है। फलतः देश में अनेक उपासना पद्धतियों, पंथों, दर्शनों, जीवन-प्रणालियों, भाषाओं, साहित्यों और कलाओं का विकास हुआ, जो सम्पन्नता की द्योतक हैं। हमें उनके प्रति अपनत्व और गौरव का भाव लेकर चलना होगा। किन्तु, विविधता के नाम पर विभाजन को प्रोत्साहन देना भूल होगी। भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बँधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक ही रहा है। मजहब अथवा क्षेत्र के आधार पर पृथक् संस्कृति की चर्चा तर्कविरुद्ध ही नहीं, भयावह भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता की जड़ पर ही कुठाराघात करती है। क्षेत्र, प्रदेश, जाति, पंथ, भाषा, भूषा आदि के आधार पर भारतीय जन की पृथकता की कल्पना भ्रामक है। उनके आधार पर भारत में अनेक राष्ट्रों अथवा राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व का विचार भी मूलतः अशुद्ध है। हम एक राज्य में रहने के कारण एक नहीं है. अपितु हम एक हैं, इसलिए भारत एक राष्ट्र है। राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा ही राष्ट्रीयता का निकष होने के कारण भारत के सभी जनों को अपनी निष्ठाओं को इसके अधीन बनाना होगा। इसके लिए दोहरा प्रयत्न आवश्यक है। एक ओर जहाँ अपने प्रदेश, पंथ अथवा जाति के प्रति निष्ठा रखने वालों को राष्ट्रनिष्ठ बनाना होगा, वहाँ दूसरी ओर भारत से बाहर निष्ठा रखने वालों को फिर से, चाहे वे पाकिस्तानपरस्त हों, अथवा रूस और चीन के भक्त, उन्हें उससे विरत करना होगा।

उपासना, मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतन्त्रता भारतीय संस्कृति की परम्परा रही है। भारतीय संविधान ने भी इसे स्वीकार किया है। किन्तु मजहब के आधार पर किसी को ‘अल्पमत’ अथवा ‘बहुमत’ वाला मानना न तो राष्ट्रीय एकात्मता के लिए हितावह है और न सत्यसंगत ही। मुसलमान अथवा ईसाई कहीं बाहर से नहीं आये। उनके पूर्वज हिन्दू ही थे। मजहब बदलने से न राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता है। मुसलमानों अथवा ईसाइयों को अल्पमत मानने का अर्थ होगा मजहब को राजनीतिक, आर्थिक व समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में एक विभाजक रेखा स्वीकार करना। यह तो प्रच्छन्न रूप से द्विराष्ट्रवाद अथवा बहुराष्ट्रवाद को मान्यता देना होगा।

भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक है। सांस्कृतिक एकता की अनुभूति राजनीतिक एकता के पक्ष की प्रेरक शक्ति रही है। राजनीतिक एकता के अभाव ने देश की सांस्कृतिक धारा को कभी खण्डित नहीं होने दिया। विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। हमने एकरूपता की नहीं अपितु एकता की कामना की है। भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बँधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक ही रहा है। मजहब और क्षेत्र के आधार पर पृथक संस्कृति की चर्चा तर्कविरुद्ध ही नहीं भयावह भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता की जड़ पर ही कुठाराघात करती है।