आओ फिर से दिया जलाएँ...

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

भरी दुपहरी में अँधियारा, सूरज परर्छाइं से हारा,
अन्तरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।
हम पड़ाव को समझे मंजिल, लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल,
वर्तमान के मोहजाल में, आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।
आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा, अपनों के विध्नों ने घेरा,
अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

(इस कविता के माध्यम से अटल जी संदेश दे रहे हैं कि वर्तमान में जीना सीखें। पड़ाव पर पहुॅचकर आलस्य के शिकार न हो जायें। अभी राष्ट्र निर्माण का यज्ञ अधूरा है और दधीचि की तरह आत्मोत्सर्ग एवं आत्मार्पण करने के लिए तत्पर होना चाहिए। )