अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"
यमुना तट, टीले रेतीले, घास-फूस का घर डाँडे पर,
गोबर से लीपे आँगन में, तुलसी का बिरवा, घण्टी स्वर,
माँ के मुँह में रामायण के दोहे-चौपाई रस घोलें!
आओ, मन की गाँठें खोलें।
बाबा की बैठक में बिछी चटाई, बाहर रखे खड़ाऊँ,
मिलने वाले के मन मंे असमंजस जाऊँ या न जाऊँ?
माथे तिलक, नाक पर ऐनक, पोथी खुली, स्वयं से बोलें।
आओ, मन की गाँठें खोलें।
सरस्वती की देख साधना, लक्ष्मी ने सम्बन्ध न जोड़ा,
मिट्टी ने माथे का चंदन, बनने का संकल्प न छोड़ा,
नये चर्च की अगवानी में टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें।
आओ, मन की गाँठें खोलें।