अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"
ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है, जमती है सिर्फ बर्फ,
जो कफन की तरह सफेद
और मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
जो जितना ऊँचा,
उतना ही एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ही ढोता है,
चेहरे पर मुस्काने चिपका,
मन ही मन रोता है।
जरूरी यह है कि ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य ठूंठ-सा खड़ा न रहे, औरों से घुले मिले,
किसी को साथ ले, किसी के संग चले ।
भीड़ में खो जाना, यादों में डूब जाना, स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ, जीवन को सुगन्ध देता है।
धरती को बौनों की नहीं, ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान को छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें।
मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूँ, इतनी रूखाई कभी मत देना।