जीवन बीत चला

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

कल, कल करते, आज हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्यत् की चिंता में वर्तमान की बाजी हारे,
पहरा कोई काम न आया, रसघट रीत चला।
जीवन बीत चला..
हानि-लाभ के पलड़ों में तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया,
मुझे हाट में छोड़ अकेला,
एक-एक कर पीत चला। जीवन बीत चला..