फिर यह कैसा बन्धन है

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

कवि आज सुना वह गान रे,
जिससे खुल जाएँ अलस पलक,
नस-नस में जीवन झंकृत हो, हो अंग-अंग में जोश ललक।
यह भूख-भूख सत्यानाशी बुझ जाए उदर की जीवन में।
हम वर्षों से रोते आए अब परिवर्तन हो जीवन में।
क्रन्दन-क्रन्दन चीत्कार और, हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए, यह वर्षों से दुख का संचय।
अरे! हमारी ही हड्डी पर, इन दुष्टों ने महल रचाए।
हमें निरन्तर चूस चूस कर, झूम-झूम कर कोष बढ़ाए।
रोटी-रोटी के टुकड़े को,
बिलख-बिलखकर लाल मरे हैं।
इन मतवाले उन्मत्तों ने, लूट-लूट कर गेह भरे हैं।
रोना, भूखों मरना, ठोकर खाना, क्या यही हमारा जीवन है?
हम स्वच्छन्द जगत में जन्मे, फिर कैसा यह बन्धन है ?
मानव स्वामी बने और-मानव ही करे गुलामी उसकी।
किसने है यह नियम बनाया, ऐसी है यह आज्ञा किसकी ?
सब स्वच्छन्द यहाँ पर जनमे,
और मृत्यु सब ही पाएँगे।
फिर यह कैसा बन्धन जिसमें, मानव पशु-से बंध जाएँगे ?
हम दीवाने आज जोश की-मदिरा पी उन्मत्त हुए।
सब में हम उल्लास भरेंगे, ज्वाला से सन्तप्त हुए।
रे कवि ! तू भी स्वरलहरी से, आज आग में आहुति दे।