अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"
पन्द्रह अगस्त का दिन कहता-आजादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी हैं, रावी की शपथ न पूरी है।।
जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश गम की काली बदली छाई।।
कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं।।
भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाये जाते हैं।
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाये जाते हैं।।
बस इसीलिए तो कहता हूँ आजादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है।।
दिन दूर नहीं खण्डित भारत को पुनः अखण्ड बनायेंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनायेंगे।।
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करंे।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें।।
(यह कविता अटल जी ने 15 अगस्त 1947 को लिखी थी जिसमें उन्होंने 1929 में राष्ट्र नायकों द्वारा रावी नदी के किनारे लिए गए शपथ का उल्लेख किया है और राष्ट्र नायकों के पूर्ण स्वराज के स्वप्न को पूरा करने के संकल्प को दोहराया है)