आने वाला कल हमारा होगा

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

स्वागताध्यक्ष महोदय, प्रतिनिधि बन्धुओं, बहनों और सज्जनगण,

दिन जाते देर नहीं लगती। काल का चक्र निरन्तर चलता रहता है। वह न किसी के लिए थमता है, न रुकता है। आठ मास पूर्व जब हम जनसंघ के 18वें अधिवेशन के लिए कालीकट में एकत्र हुए थे, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय हमारे बीच में थे। कितने उल्लास और उत्साह के साथ हमने उन्हें अपना अध्यक्ष निर्वाचित किया था। अनेक वर्षों से अध्यक्ष बनने का हमारा आग्रह वह टालते जा रहे थे। जब कभी हम उनका नाम रखते, वे बड़ी चतुराई से किसी अन्य कार्यकर्ता को अध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाकर, अपना पीछा छुड़ा लेते। किन्तु इस बार हमने ऐसी व्यूह रचना की कि उन्हें हार माननी पड़ी। उनकी अनिच्छा पर हमारा आग्रह विजयी हुआ। कालीकट में उन्हें अध्यक्ष पद पर देखकर हम फूले नहीं समाते थे। संगठन के कर्ताधर्ता वह पहले ही थे। अब उन्होंने प्रत्यक्ष नेतृत्व भी सम्हाल लिया था। हमें विश्वास था कि उनके मार्गदर्शन में भारतीय जनसंघ देश की आशाओं और आकांक्षाओं को पूर्ण करने का समर्थ और सक्षम साधन बनेगा और कांग्रेस के बिखराव से उत्पन्न राजनीतिक शून्य को भरने में सफल होगा। किन्तु हमारी आशाओं पर वज्रपात हो गया, हमारे सपने अधूरे रह गये। हत्यारों ने उपाध्याय जी को हमारे बीच में से हटा दिया। नन्दा दीप बुझ गया। मध्याह्न के पूर्व ही सूर्य अस्त हो गया। हमने अपना बन्धु, सखा और मार्गदर्शक खो दिया। भारत एक चिन्तक, मनीषी और कर्मयोगी की सेवाओं से वंचित हो गया। वे देश के लिए जन्मे, जीये, जूझे और हौतात्म्य को प्राप्त हुए। उनके निधन से सार्वजनिक जीवन की एक अपूर्णीय क्षति हुई है।

1962 मंे राज्यसभा में जनसंघ के 2 सदस्य चुने गये थे। आज वहां हमारे सदस्यों की संया 11 है। सच है, एक और एक दो नहीं होते, एक और एक ग्यारह भी होते हैं। राष्ट्रीय एकीकरण एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। यह ऐसा एक भाव है, जिसे प्रयत्नपूर्वक जगाना और बड़ी सावधानी के साथ बढ़ाना होगा। रास्ता लम्बा और कठिन है। इतने बड़े और विविधताओं से परिपूर्ण देश में जो आर्थिक तथा सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में से गुजर रहा है और लोकतंत्र के मार्ग से अपने उद्देश्यों की सिद्धि करना चाहता है। यत्र-तत्र अप्रिय घटनाओं को बिल्कुल ही नहीं रोका जा सकता। किन्तु जन-नेताओं को धैर्य नहीं खोना चाहिए और न भयातंकित होकर ही कोई कार्य करना चाहिए।

राष्ट्रीय एकात्मता के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए हमें कुछ बुनियादी तथ्यों को समझना और स्वीकार करना होगा। प्रथम, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैला हुआ। यह भारत एक राष्ट्र है. अनेक राष्ट्रीयताओं का समूह नहीं। विभिन्न भाषा-भाषी समूहों को पृथक राष्ट्रीयता की संज्ञा देने वाले विघटन और विनाश के वाहक हैं, उनसे हमें सावधान रहना चाहिए। द्वितीय भारत एक प्राचीन राष्ट्र है। हमें किसी नये राष्ट्र का निर्माण नहीं करना है, बल्कि इस प्राचीन राष्ट्र को आधुनिक काल को चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाना है। आथर्वण श्रुति में जब हमने यह घोषणा की कि माता भूमिः पुत्रों अहं पृथिव्याः मानो उसी दिन हमने राष्ट्रीयता की उद्घोषणा कर दी। पश्चिम के विद्वानों के लिए राष्ट्रीयत्व की परिकल्पना एक आधुनिक कल्पना हो सकती है, किन्तु हमारे लिए वह उतनी ही प्राचीन है, जितना प्राचीन भारत भूमि पर हमारा जीवन है। भारतीय राष्ट्र मूलतः एक सांस्कृतिक इकाई है। सांस्कृतिक एकत्व के आधार पर ही हमने राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक एकता की स्थापना के प्रयत्न किये है। जब कभी इन प्रयत्नों को सफलता नहीं मिली और भारत अनेक राज्यों में बंट गया तब भी हमारी सांस्कृतिक एकता अक्षुण्ण रही और इसी को आधार बनाकर हम अन्य क्षेत्रों में एकता के लिए सतत् संघर्ष करते रहे। आज भी हम इसलिए एक नहीं है कि हम एक ही राज्य के नागरिक है, अपितु हम एक हैं इसलिए भारत एक राज्य देश है। हमारा राष्ट्र-जीवन विविधताओं से परिपूर्ण है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं अनेक सम्प्रदाय तथा मत मतान्तर हैं, अनेक रहन-सहन के ढंग प्रचलित हैं. कला और साहित्य की अनेक विधियाँ और शैलियाँ विद्यमान है। ये विविधतायें हमारे जीवन की समृद्धि का परिचायक है। हमें इनका रक्षण तथा विकास करना है। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं होता। हमें विविधताओं में एकता की खोज करनी है और उसे सुदृढ़ बनाना है।

भारतीय जनता को भाषा, प्रदेश, सम्प्रदाय, जाति तथा व्यवसाय आदि के आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समाज में विभाजित करना तो और भी खतरनाक है। भारत के प्रति अनन्य निष्ठा रखने वाले सभी भारतीय एक हैं फिर उनका मजहब भाषा तथा प्रदेश कोई भी क्यों न हो। एक ओर तो हमें छोटी-छोटी निष्ठाओं से ऊपर उठकर भारत को अपनी सर्वोपरि निष्ठा का केन्द्र बनाना होगा और दूसरी ओर भारत में वाह्य निष्ठा रखने वालों को ऐसी निष्ठाओं से परावृत कर देशभक्ति के रंग में रंगना होगा। मुसलमान या ईसाई बाहर से नहीं आए। उनके पूर्वज हिन्दू ही थे, उनकी नसों में हिन्दू रक्त ही प्रवाहित होता है। मजहब बदलने से राष्ट्रीयता अथवा संस्कृति नहीं बदलती। संस्कृति का सम्बन्ध मिट्टी से और राष्ट्रीयता का नाता निष्ठा से होता है। पूर्व बंगाल तथा पख्लूनिस्तान के मुसलमानों का मजहब एक है, किन्तु उनकी संस्कृतियाँ भिन्न हैं। राष्ट्र के प्रति निष्ठा में परिवर्तन होने पर समान उपासना पद्धति का अनुसरण करने वाले भी पंचमांगी कहे जाते हैं और उनके प्रति इसी दृष्टि से व्यवहार करना पड़ता है।

भारतीय जनसंघ (भाजपा) ऐसे एक समाज तथा राज की रचना में विश्वास करता है, जिसमें सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के अवसर की समता प्राप्त होगी। भाषा तथा सम्प्रदाय के आधार पर न तो किसी के प्रति भेदभाव की नीति बरती जायेगी और न इस आधार पर किसी के साथ पक्षपात से काम लिया जायेगा। सभी भाषाओं और उपासना पद्धतियों को फूलने-फलने की पूरी छूट होगी। सेक्युलरवाद के नाम पर पृथकतावादी मनोवृत्तियों और तत्वों को बढ़ावा देने की नीति राष्ट्रीय एकात्मता के लिए घातक सिद्ध होगी। साम्प्रदायिकता के कारण एक बार देश का विभाजन हो चुका है। अब हमें उस दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास की पुनरावृत्ति को रोकना होगा। सेक्युलर का अर्थ है इहलौकिक। भारत में, पश्चिम की तरह, राज्य तथा धर्म-व्यवस्था के बीच कभी संघर्ष नहीं रहा। जो लोग सेक्युलर शब्द का अनुवाद धर्म-निरपेक्ष करते हैं वे न धर्म को समझते हैं और न सेक्युलर शब्द की मूल भावना को ही ग्रहण कर पाते हैं। सेक्युलर का अर्थ धर्म-विरोधी या धर्म-विहीन नहीं होता। न भारत की जनता इस अर्थ में कभी सेक्युलर हो ही सकती है। सेक्युलर का अर्थ इतना ही है कि राज्य की अपनी कोई उपासना पद्धति नहीं होगी और वह सभी मतों, पन्थों और उपासना पद्धतियों के प्रति समान भाव रखेगा। संक्षेप में, सेक्युलर का सही अर्थ है-सम्प्रदाय-निरपेक्ष। भारतीय जनसंघ वर्तमान (भाजपा) एक सम्प्रदाय निरपेक्ष राज्य का हामी है और किसी विशेष उपासना पद्धति को राज्य की उपासना पद्धति बनाने में विश्वास नहीं रखता ।

देश में ऐसे तत्त्व बल पकड़ रहे हैं जो सेक्युलरवाद की आड़ में भारत को उसके गौरवपूर्ण अतीत, महान् जीवन-दर्शन तथा उसके श्रेष्ठ महापुरुषों, सन्तों-संन्यासियों तथा पराक्रमशाली पुरुषों के ज्ञान और अभिमान से वंचित कर देना चाहते हैं। अतीत से नाता तोड़कर न तो हम वर्तमान चुनौतियों का ही सामना कर सकते हैं और न ही भावी का निर्माण करने में ही समर्थ हो सकते हैं। हमें भारत को एक आधुनिक राष्ट्र बनाना है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी की नवीनतम उपलब्धियों का उपयोग कर देश को समृद्ध तथा जन-जन को सुखी देखना है। किन्तु इसके लिए अतीत को अमान्य करना अथवा परम्परागत संस्कृति से नाता तोड़ना हम कभी स्वीकार नहीं करेंगे। वेदकाल से लेकर आज तक जो जीवन की धारा अखण्ड और अविच्छिन्न रही है, हमें अधिक वेगवान और प्रचण्ड बनाना होगा और इधर-उधर से आने वाली छोटी-छोटी नदियों को अपने में समेटकर उन्हें आत्मसात कर मानवता के समुत्क और निवेयस व पथ प्रशस्त करना होगा। देश के विभिन्न भागों में हुए साम्प्रदायिक दंगे गम्भीर चिन्ता का विषय हैं। सन् 1947 के पूर्व इन दंगांे के लिए अग्रेजी सरकार को दोष देकर हम अपने दायित्व की इतिश्री समझ लेते थे। किन्तु स्वाधीनता की प्राप्ति तथा पाकिस्तान की स्थापना के बीस वर्ष बाद भी इन दंगों का होना यह बताता है कि हम रोग के लक्ष्य को ही रोग मानने की भूल करते रहे हैं और आज भी इस सम्बन्ध में बुनियादी चिन्तन के लिए तैयार नहीं हैं। इस बात पर गम्भीरता से विचार होना चाहिए कि व्यक्तिगत झगड़े साम्प्रदायिक दंगों का रूप क्यों लेते हैं? क्या कारण है कि होली का रंग पड़ने अथव गोहत्या जैसी घटनाएँ व्यापक पैमाने पर लूटमार को जन्म देती हैं? इन दंगों के दौरान पाकिस्तान समर्थक नारे लगाना तथा पाकिस्तान रेडियो द्वारा दंगों के तुरन्त बाद ही उसके समाचार बढ़ा बढ़ाकर प्रसारित करना सारे प्रश्न को और भी पेचीदा बना देता है। गत कुछ वर्षों में मुसलमानों के बीच ऐसे सम्प्रदायवादी संगठनों की शक्ति तथा प्रभाव में भारी वृद्धि हुई है, जो पृथकतावादी हैं और मुसलमानों को अलग थलग रखने का अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं।

वस्तुतः सभी भारतीयों के सम्मुख फिर वे किसी भी सम्प्रदाय को मानने वाले और कोई भी भाषा बोलने वाले हो, समान समस्याएँ हैं। ये समस्याएँ देश के आर्थिक पिछड़ेपन से पैदा हुई हैं। इन्हें साम्प्रदायिक, भाषायी अथवा क्षेत्रीय रूप देकर न केवल राष्ट्रीय एकात्मता के मार्ग में रोहे ही अटकाये जाते हैं, अपितु इन समस्याओं का समाधान भी अधिक कठिन बनाया जाता है। राजनीतिक दलों का पह कर्तव्य है कि वे लोगों को सही शिक्षा दें और उन्हें स्वार्थी और संकीर्णतावादी कठमुल्लों के चंगुल में पड़ने से रोके। यह आश्चर्य की बात है कि जो राजनीतिक दल सेक्युलरवाद का सबसे अधिक ढिंढोरा पीटते हैं और साम्प्रदायिकता को कोसने में सबसे आगे रहते हैं, वे न केवल दलगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक तत्त्वों के साथ समझौते करते हैं अपितु अत्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर उनकी ऐसी मांगों को अपना समर्थन देने में भी संकोच नहीं करते जो राष्ट्रीयता के लिए घातक और लोकतंत्र के सर्वथा प्रतिकूल होती हैं। यदि देश को साम्प्रदायिकता की विभीषिका से बचाना है तो राजनीतिक दलों को यह संकल्प करना होगा कि वे मन् वचन तथा कर्म में साम्प्रदायिकता को प्रश्रय नहीं देंगे। भारत की सभी समस्याओं का हल हृदय-हृदय में प्रखर राष्ट्रीयता का भाव जगाने में है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा और आने वाले कल के लिए निरन्तर पसीना और आवश्यकता पड़ने पर रक्त बहाने का संकल्प ही हमें साम्प्रदायिकता, भाषावाद तथा क्षेत्रीयता से ऊपर उठाने और महान् भारत के कर्तव्यप्रवण नागरिक के नाते आचरण करने की प्रेरणा दे सकता है। भारतीय जनसंघ वर्तमान (भाजपा) इसी कार्य में जुटा हुआ है। यदि सम्भव हुआ तो अन्य दलों के सहयोग से और यदि आवश्यक हुआ तो अकेले अपने बूते पर हमने सभी विघटनकारी शक्तियों और उनके पृष्ठपोषकों से लड़ने और उन्हें पराभूत करने का निश्चय किया है। इस पुनीत कार्य में भारत की जागरुक और प्रबुद्ध जनता के समर्थन का हमें पूर्ण विश्वास है।

अब यह कहा जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान में संशोधन करने के संसद के अधिकार को सीमित कर दिया है और इसलिए संसद को अपने अधिकार की पुनः प्रतिष्ठा के लिए पग उठाना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि इस परिवर्तनशील विश्व में अपरिवर्तनीय मूल अधिकारों की परिकल्पना प्रतिगामी तथा प्रतिक्रियावादी स्वरूप की है और उसे ठुकरा दिया जाना चाहिए।

जहाँ तक संसद के अधिकारों का प्रश्न है ये अधिकार संविधान से ही प्राप्त होते हैं और संविधान द्वारा निर्धारित मर्यादाओं में ही उनका उपयोग किया जा सकता है। भारत में संविधान सर्वोपरि है, न कि संसद। यह ठीक है कि स्वयं संविधान ने संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार दिया है किन्तु यह अधिकार एक निश्चित मर्यादा तथा निश्चित प्रक्रिया के भीतर ही प्रभावी हो सकता है। स्पष्टतः संसद को यह अधिकार नहीं है कि वह दो-तिहाई बहुमत से संविधान का स्वरूप ही बदल दे या उन आधारभूत मान्यताओं में परिवर्तन कर दे जिन पर हमारा संविधान आधृत है। उदाहरण के लिए संसद भारतीय लोकतंत्र को राजतंत्र रूप नहीं दे सकती और वह अस्पृश्यता को कानून ने सम्मत ही घोषित कर सकती है। जैसा कि भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० अम्बेडकर ने कहा था, मूल अधिकार संविधान की ‘आत्मा’ है जिसके हनन का अधिकार संसद को नहीं दिया जा सकता। देश के अनेक स्थानों से दलितों के साथ की गई ज्यादतियों तथा दुर्व्यवहार के समाचार आये हैं। इन समाचारों ने सारे देश को झकझोरा है और हमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित आदिम जातियों के सम्बन्ध में नये सिरे से सोचने के लिए विवश किया है।

संविधान में अस्पृश्यता का अंत कर दिया है। उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध है। अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध है और कानून के अनुसार दण्डनीय है। संविधान ने हिन्दुओं की सभी सार्वजनिक धर्म-संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गो और विभागों के लिए रास्ता खोल दिया है। दहेज बाल-विवाह, नारी अवमानना जैसे दोष जो शताब्दियों से हमारे समाज में घुन की तरह लगे रहे, आज भी हमें जर्जर बना रहे हैं।

यदा-कदा हिन्दुओं की घटती हुई जनसंख्या पर गम्भीर चिन्ता प्रकट करके अथवा अपनी भूलों के लिए दूसरों पर दोषारोपण करके हम अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते। आवश्यकता है कि हिन्दू समाज में सुधार का एक देशव्यापी तथा प्रचण्ड आंदोलन बलाया जाये। यह आंदोलन गैर-दलीय आधार पर होना चाहिए और सभी विचारों तथा वर्गो के लोगों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए। नौजवानों से मेरी अपील है कि वे सामाजिक कुरीतियों और अन्धविश्वासों से टक्कर लेने के लिए आगे बड़े। सामाजिक दृष्टि से पिछड़े रहकर हम न तो आत्मरक्षा ही कर सकते हैं और न राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकते हैं। सच्चाई यह है कि आज बस्तर से लेकर बर्मा की सीमा तक जितना भी आदिवासी क्षेत्र है, उसमें असंतोष, रोष और कहीं-कहीं बगावत की लहर उठ रही है। बढ़ती हुई आकांक्षाओ और अपर्याप्त उपलब्धियों की खाई ने एक खतरनाक रूप धारण कर लिया है। विदेशी शक्तियां इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए उत्सुक और उद्यमशील है। बागी नागाओं द्वारा चीन तथा पाकिस्तान से साँठगाँठ के समाचार पुष्ट हो चुके हैं। उपद्रवी मिजो भी बाहर से समर्थन तथा सहयोग प्राप्त करने के लिए प्रथलशील हैं। बिहार के आदिवासी क्षेत्रों के साथ उड़ीसा तथा आन्ध के आदिवासी क्षेत्र लगे हुए हैं। महाराष्ट्र, गुजरात तथा राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र भी सदियों की निद्रा में आंखें खोल रहे हैं। मुझे लगता है कि परिगणित जातियों और परिगणित जनजातियों को हमें एक दूसरे से नत्थी नहीं करना चाहिए। दोनों की समस्याएँ सम्बद्ध होते हुए भी अलग-अलग स्वरूप की है। उनका अध्ययन तथा समाधान भी विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न ढंगों से होना चाहिए। उदाहरण के लिए, परिगणित जातियों तथा परिगणित जनजातियों के लिए अलग-अलग आयुक्त होने चाहिए। आयोग के क्रियाकलाप को दिल्ली में ही केन्द्रित करने की नीति कहाँ तक फलदायी सिद्ध होगी, यह भी संदेहास्पद है। आयोग का एक प्रमुख काम हरिजनों तथा गिरिजनों के सम्बन्ध में संसद और शासन को सही जानकारी देने का है। यदि उसके प्रतिवेदनों से विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त असंतोष तथा विभिन्न वर्गों के मध्य उत्पन्न नये तनावों की जानकारी और उनका गहरा विश्लेषण मिल सके तो समय रहते रोकथाम के उपाय किए जा सकते हैं।

मुझे संदेह है कि हमारा संविधान धर्मान्तरण की अनुमति देता है। ‘अन्तःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने के समान ‘हक’ में दूसरे को धर्मान्तरित करने का अधिकार शामिल है या नहीं, यह विवादग्रस्त है। संविधान परिषद् में इस प्रश्न पर काफी चर्चा हंई थी, किन्तु प्रश्न अभी तक अनिर्णीत ही है। यदि सभी उपासना पद्धतियाँ एक ही सत्य की प्राप्ति का साधन हैं तो फिर एक को छोड़कर दूसरी को अपनाने की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है? यदि हैं तो दूसरे धर्म में जाने की जरूरत ही क्या?

खेती भारत का बुनियादी उद्योग है। उससे न केवल हमारी खाद्यान्न की आवश्यकता पूरी होती है. अपितु उद्योग धन्धों के लिए कच्चा माल भी प्राप्त होता है। अन्नोत्पादन में आत्मनिर्भर हुए बिना हम न तो औद्योगिक विकास का सुदृढ़ ढाँचा ही तैयार कर सकते हैं और न ही विदेशों पर अपनी खतरनाक निर्भरता ही समाप्त कर सकते है। खेती के विकास के लिए यह आवश्यक था कि भूमि-सुधारों को दृढ़ता के साथ लागू किया जाता और किसानों के मन में किसी प्रकार की अनिश्चितता का भाव न रहने दिया जाता। इस दिशा में हमारी प्रगति असंतोषजनक और अनमनी रही है। अनेक राज्यों में जोतबन्दी के कानून या तो लागू ही नहीं हुए अथवा इस ढंग से लागू हुए कि उनका उद्देश्य विफल हो गया। भारतीय जनसंघ (भाजपा) अपनी स्थापना से इस बात पर बल दे रहा है कि अन्नोत्पादन की वृद्धि के लिए हमें सिचाई की छोटी छोटी तथा मध्यम योजनाओं पर बल देना चाहिए। विशालकाय बाँधांे का अपना उपयोग है। वे हमारी बिजली की कमी को पूर्ण करने में महत्वपूर्ण भाग लेते हैं किन्तु उनके लिए न तो आवश्यक पूँजी हमारे पास है और न लागत के अनुपात में उनसे खेती को लाभ ही मिलता है। देश के अनेक भूभागों में भूमि और जलतल की स्थिति इस प्रकार है कि बड़े बाँधों के कारण सेम और भूक्षार उत्पन्न होकर भूमि के खेती के लिए अनुपयोगी होने की आशंकाएँ है। यदि हम प्रारम्भ से ही छोटी योजनाओं में नलकूपों का जाल फैलाने पर बल देते तो आज देश के अनेक भागों को विशेषतः आंध्र उड़ीसा और मैसूर के कुछ हिस्सों को सूखे से उत्पन्न अभाव की गम्भीर स्थिति का सामना न करना पड़ता।

इस वर्ष गेहूं की फसल बहुत अच्छी हुई है। इसके लिए भारत सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है और ‘गेहूं उत्पादन में क्रांति’ का दर्शन कर रही है। सचाई तो यह है कि अच्छी फसल के लिए पहले तो इन्द्र देवता और फिर हमारे परिश्रमी किसान अभिनन्दन के अधिकारी हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पैदावार की वृद्धि कृषि भूमि के केवल एक तिहाई हिस्से में हुई है उस हिस्से में जिसमें सिचाई की सुविधा प्राप्त है। शेष भाग अब भी आसमान की ओर टकटकी लगाए देख रहा है और विपुलता में अभाव का अनुभव कर रहा है। स्पष्टतः हमारा कृषि विकास संतुलित नहीं है और न उसे स्थायी ही माना जा सकता है। पर्याप्त वर्षा के अभाव में खेती की स्थिति क्या होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। कृषि विकास का एक चिन्ताजनक पहलू यह है कि पैदावार बढ़ते ही दामों में गिरावट आने लगती है जिससे शहरों में रहने वाले तथा निश्चित आय वाले वर्ग को तो राहत मिलती है, किन्तु किसान के लिए संकट खड़ा हो जाता है। यह संकट उस किसान के लिए और भी गहरा रूप धारण कर लेता है, जिसकी पैदावार तो नहीं बढ़ती, किन्तु जिसे दामों में कमी की चपेट का सामना करना पड़ता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जहां अन्न के दामों में थोड़ी गिरावट आई है, वहाँ किसान की लागत पानी बीज खाद बैल आदि के मूल्यों में कोई कमी नहीं हुई। कुछ मामलों में तो उनमे बढ़ोतरी ही हुई है। दूसरी ओर खेती तथा उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के दामों में किसी प्रकार का तालमेल न होने के कारण एक ओर किसान के हित को चोट पहुंची है और दूसरी ओर अच्छी फसल होने के बावजूद जीवन मूल्यों के सूचकांक में वांछित कमी नहीं आई जिससे केन्द्र तथा राज्य के कर्मचारियों तथा औद्योगिक मजदूरों की अतिरिक्त महंगाई भत्ते की माँग यथावत् है।

राजकीय कर्मचारियों तथा सबसे अधिक बेकारों और अर्द्धबेकारों की भारी भीड़ में पहले ही असन्तोष, अवज्ञा और कुण्ठा की भावना घर बना रही है। यदि हम उन्हें थोड़ी भी बेहतर जिन्दगी का आश्वासन नहीं दे सकेंगे तो उसके गम्भीर राजनीतिक और सामाजिक परिणाम होंगे किन्तु इसके लिए आर्थिक विकास की जो गति चाहिए उसके लिए न हमारे पास पूँजी है. न विदेशी मुद्रा है और न कच्चा माल ही है। स्पष्ट है कि हमे नियोजन के स्वरूप और उसकी व्यूह रचना में क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे। विदेशी सहायता पर निर्भर भारी उद्योगों के पीछे भागने की बजाय, हमें छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों को अपना आधार बनाना होगा। मशीन बनाने के कारखाने हम खड़े कर चुके हैं।

प्रशिक्षित इंजीनियर तथा तकनीकी ज्ञान से युक्त नौजवान अवसर की खोज में भटक रहे है। भारत के लिए उपयुक्त टेक्नोलॉजी का विकास कर हम औद्योगिक क्षेत्र में एक नये अध्याय का शुभारम्भ कर सकते हैं। आन्दोलनात्मक तथा रचनात्मक दोनों ही प्रकार के कार्यक्रम अपनाकर हमें जनता के कष्टों का निवारण करने के लिए आगे बढ़ना है। देश को हमसे बड़ी आशायें हैं। हम परिस्थिति की चुनौती को स्वीकार करें। आँखों में एक महान् भारत के सपने, हृदयों में उन सपनों को सत्य सृष्टि में परिणित करने के लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा करने का संकल्प भुजाओं में समूची भारतीय जनता को समेटकर उसे सीने से लगाये रखने का सात्त्विक बल और पैरों में युग परिवर्तन वर्षे गति लेकर हम बलना है। डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ० रघुबीर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पवित्र स्मृति से प्रेरणा लेकर हम कर्तव्य पथ पर कदम बढ़ायें। विजय हमारी होगी, आने वाला कल हमारा होगा।

वन्दे-मातरम्