आजादी अमर शहीदों व सेनानियों की देन हमें इसकी रक्षा करनी होगी

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

मेरे प्यारे देशवासी, बहनों, भाइयों और बच्चों।

अपने देश की स्वतंत्रता की 51 वीं वर्षगाँठ पर मेरी ओर से आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ ।

देखते-देखते आधी शताब्दी बीत गई। लगता है, कल की ही बात है। पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने इसी स्थान पर पहली बार हमारा प्यारा तिरंगा नीले आसमान में पहराया था। उसके पश्चात् प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर इस ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्रीय ध्वज फहराने की परंपरा चलती आ रही है। मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि यह सौभाग्य एक दिन मुझे भी मिलेगा। एक गरीब स्कूल मास्टर के लड़के का धूल और धुएँ से भरी बस्ती से उठकर लाल किले की प्राचीर तक पहुँचना और स्वतंत्रता के पावन पर्व पर तिरंगा फहराना, यह भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और क्षमता को उजागर करता है। हम सब जानते हैं कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है। एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आंदोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएं सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रांतिकारियों ने हँसते-हँसते फांसी का तख़्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान दिया। हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदांे और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है।

आइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े। हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है। 50 वर्षो के इस छोटे से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। मेरी मान्यता है कि दुनिया में कोई समस्या ऐसी नहीं है, जिसका बातचीत से हल नहीं हो सकता। इसलिए पाकिस्तान हो या चीन, हम सबसे मैत्री भाव से बातचीत करके आपसी समस्याओं का हल ढंूढने के लिए प्रयास करते रहेंगे। हमारे शास्त्रों में कहा है- ‘‘आत्मप्रशंसा मूर्खो का लक्षण है।’’ लेकिन अनावश्यक आत्मनिंदा भी आत्महत्या के समान है। मैं यथार्थवादी दृष्टि से 50 वर्षों का लेखा-जोखा देना चाहता हूँ। जब हम आजाद हुए थे, तब कुछ पश्चिम के पंडितों ने भविष्यवाणियाँ की थीं कि हम जनतंत्र और स्वतंत्रता के लायक नहीं हैं। जल्दी ही हम बिखरकर नष्ट हो जायेंगे। लेकिन आज हम गर्व से कह सकते हैं कि न हमने केवल अपनी अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा की है, अपितु विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया है। जो राष्ट्र हमारे साथ आजाद हुए, वे लगभग सभी कभी न कभी तानाशाही या सेनाशाही का शिकार हुए, लेकिन हमने लोकशाही का दीप हमेशा जलाए रखा।

हर चुनाव में आपने ऐसा चमत्कार करके दिखाया कि सभी पंडित-ज्ञानी हतप्रभ रह गए। आपको बहुत-बहुत बधाई। जब तक आप जागरु़क हैं, हमारे जनतंत्र पर कोई आंच नहीं आ सकेगी। आज के स्वर्ण जयंती समापन समारोह के अवसर पर एक महत्त्वपूर्ण तथ्य पर पूरे राष्ट्र को सोचना है। स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता (सेक्युलरवाद)- ये चारों एक-दूसरे के पूरक हैं। हमें हर हालत में स्वतंत्र रहना है। स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त है-राष्ट्रीय एकता। राष्ट्रीय एकता के लिए लोकतंत्र जरूरी है। पंथनिरपेक्षता (सेक्युलरवाद) लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का अटूट हिस्सा है। मैं और मेरी सरकार इन चारों तत्वों के प्रति प्रतिबद्ध है। हम हर तरह की सांप्रदायिकता के विरुद्ध हैं और जो समुदाय संख्या में कम हैं, उनकी पूरी सुरक्षा और विकास में भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम एक राष्ट्र के नागरिक हैं। लद्दाख से लेकर निकोबार तक फैला हुआ है यह देश। गारो पर्वत से लेकर गिलगित तक इसका विस्तार है। यह एक प्राचीन देश है। इसकी सभ्यता और संस्कृति 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। इतना विशाल देश, इतनी विविधताओं से भरा हुआ देश, भाषाओं, उपासना-पद्धतियों, रहन-सहन, खान-पान की भिन्नताओं के बावजूद लोकतंत्र के सूत्र में बँधकर सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए कमर कसकर जुटा हुआ है। साथ-साथ हम इसे भी भूल नहीं सकते कि हमें जनतंत्र को विकृतियों से बचाना है।

लोकशाही चर्चा से चलने वाली है। विपक्ष को कहने का और सत्तापक्ष को करने का अधिकार होना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधक नहीं। निर्भय और निष्पक्ष मतदान को और निखारना होगा। चुनाव पद्धति में परिवर्तन कर उसे जातिवाद, हिंसा, धन, शक्ति आदि दुर्गुणों से मुक्त करना होगा, जिससे अगली शताब्दी में हमारा शासनतंत्र और भी निखरकर आए। एक समय था, यह देश सोने की चिड़िया कहा जाता था। बाद में स्थिति बिगड़ी और हम गरीब राष्ट्रों में गिने जाने लगे। गत कुछ वर्षों में हमारे किसानों और खेतिहर मजदूरों ने कड़ी मेहनत करके देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया है। भूखे पेट कोई सेना लड़ नहीं सकती। भूखा देश चैन की नींद सो नहीं सकता। हमारे किसान-मजदूर भाइयों ने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाकर अपनी ‘अन्नदाता’ की उपाधि सार्थक की है। मैं तो भगवान से केवल इतनी ही प्रार्थना कर सकता हूँ, ‘‘अन्नदाता सुखी भव।’’

व्यापार, उद्योग और सेवाओं में भी देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। हमारे कुछ उद्योग तो विश्व की स्पर्धा में अपने झंडे गाड़ रहे हैं। इस सफलता के लिए मैं सभी मजदूरों, कर्मचारियों, प्रबंधकों, उद्योगपतियों व व्यापारियों को बहुत बधाई देता हूँ। लेकिन हम जानते हैं कि यह सफलता एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं। हमारा अंतिम लक्ष्य है-भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में दुनिया में उभारना। मैं जानता हूँ कि यह कहना जितना आसान है, करना कठिन है। इसके लिए हमें कठोर परिश्रम, प्रामाणिकता और स्वावलंबन का मार्ग अपनाना होगा। विश्व के दर्जे का माल तैयार करना पड़ेगा जो घरेलू और विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके। अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत है। लेकिन हम उदारीकरण का अनुचित लाभ नहीं उठाने देंगे। आधारभूत ढाँचे के क्षेत्र में हमने परियोजनाओं को तीव्रता से लागू करने का निर्णय किया है। ‘स्वदेशी’ का अर्थ यह नहीं है कि हम कूप-मंडूक हो जाएँ। नई दुनिया छोटा-सा गाँव बन गई है। हम सब एक-दूसरे पर निर्भर है। हम इस खुली अर्थव्यवस्था में भी अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर विश्व स्पर्धा में डटकर खड़े रह सकते हैं और ऐसा हमारा विश्वास है कि हम डटकर खड़े रहेंगे ।

आज के स्वतंत्रता दिवस की इक्यावनवीं वर्षगाँठ केवल हमारे देश में नहीं, दुनिया भर में मनाई जा रही है। हर देश में बसा भारतीय मूल का नागरिक यह पावन पर्व हर्ष और उल्लास के साथ मना रहा है। मै विदेशों में बसे सभी भारतीयों को स्वतंता दिवस की शुभकामनाएं देता हैं। इनमें से कुछ देशों में भाई-बहन हमारे इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण टी०वी० पर देख रहे होंगे।

अनिवासी भारतीय, जहाँ वे बसे है, उन देशों की अर्थव्यवस्था में मजबूती लाए हैं। अब उन्हें भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने का अवसर मिला है। हमने अब ‘रिसर्जेंट इंडिया बॉण्ड्स’ निकाले है। दुनिया भर में बसे अनिवासी भारतीय इस अवसर का लाभ उठा रहे है। अभी तक इस योजना में पांच हजार करोड़ रुपए विदेशी मुद्रा के रूप में आए हैं। मुझे विश्वास है कि अनिवासी भारतीय और भी इसका लाभ उठाएँगे। देश का आर्थिक विकास अपने साथ-साथ कुछ समस्याएँ भी लेकर आता है। हमें उन्हें हल करना है। देश में एक और महत्त्वपूर्ण समस्या है- भ्रष्टाचार की। भ्रष्टाचार का रोग देश को कैंसर रोग के समान खाए जा रहा है। हमने इससे लड़ने का निर्णय लिया है। इसका आरंभ ऊपर से किया है। लोकसभा में पेश किए लोकपाल विधेयक में मैंने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा है। इससे हमने उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार से लड़ने की अपनी नीति और नीयत स्पष्ट की है। इसके साथ हम अफसरशाही के भ्रष्टाचार से भी लड़ना चाहते हैं। मैं जल्दी ही प्रधानमंत्री कार्यालय के उस कक्ष के कार्यान्वयन में तेजी लाऊँगा, जो भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की देख-रेख करता है। ‘बेरोजगारी हटाओ’, यह हमारे राष्ट्रीय एजेंडा का महत्त्वपूर्ण संकल्प है। बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। यह सबके जीवन के साथ जुड़ी है। सबकी न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भी यही तरीका है। पूर्ण रोजगार के लिए योजना बनाना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए नियोजन की पूरी प्रक्रिया में परिवर्तन करना होगा। बुनियादी जरूरत की चीजों और सेवाओं का उत्पादन जन-साधारण द्वारा होना चाहिए। इसके लिए विज्ञान और टेक्नोलॉजी की सहायता लेनी पड़ेगी ।

किसी भी आधुनिक समाज की प्रगति का मापदंड उस समाज में महिलाओं की स्थिति से होता है। हमने महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने का वायदा किया था। हमें खेद है कि हम इसे अभी तक पूरा नहीं कर सके हैं। लड़कियों को स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा देने का निर्णय तो हम ले ही चुके है। अब हम एक और बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाली सभी छात्राओं को उनकी पाठ्य पुस्तकें मुफ्त दी जाएँगी। युवा शक्ति ही राष्ट्र की शक्ति है, देश का भविष्य है। बहुत वर्ष पहले मैंने बाबा आप्टे का एक वाक्य पढ़ा था- ‘‘हाथ लगे निर्माण में, नहीं माँगने, मारने में।’’ हमारी भी यही इच्छा है। भारत के युवक-युवतियों को न किसी के सामने हाथ फैलाना चाहिए, न किसी पर अपने हाथों का जोर आजमाना चाहिए। सिर्फ अपने आप को राष्ट्र के पुनर्निर्माण के काम में झोंक देना चाहिए।

21वीं सदी हमारे द्वार पर दस्तक दे रही है। यह सदी सूचना की तकनीक की सदी होगी। भारत की सबसे बड़ी शक्ति है-भारत की बुद्धिमत्ता। विज्ञान और टेक्नोलॉजी में प्रशिक्षित व्यक्ति की दृष्टि से विश्व में हमारा तीसरा स्थान है। हमें इस शक्ति का दोहन करना होगा। मेरी सरकार ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में अनेक नए कदम उठाए हैं। हमारी आकांक्षा है-सूचना तकनीक ने महाशक्ति बनना। इस दृष्टि से मैं आज एक नए कदम की घोषणा कर रहा हूँ। अंतरिक्ष एक नया क्षेत्र है, जो अगली सदी में मानव जाति को नई-नई संभावनाओं को तलाशने का मौका दे रहा है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के काफी लाभ है, जिसे भारत को अपनी युना पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उपयोग में लाना होगा। मेरी सरकार ‘जय विज्ञान’ के नारे के आधार पर युवाओं के सपने साकार करना चाहती है। एक बार भारतरत्न डॉ० बाबा साहेब अम्बेडकर जी ने कहा था- ‘‘आर्थिक और सामाजिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी अधूरी है।’’ आज राजनीतिक स्वतंत्रता दिवस पर हम इस ध्येय वाक्य को भूलें नहीं। बीती हुई अर्द्धशताब्दी में हमने अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता तो अक्षुण्ण रखी, लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई अभी तक नहीं जीत सके हैं। हम देश को गरीबी से मुक्त नहीं करा सके है। बेरोजगारी अभी भी अभिशाप बनी हुई है। निरक्षरता का कलंक आज भी हम मिटा नहीं सके हैं। जातिवाद और संप्रदायवाद का भूत अभी भी बीच-बीच में सर उठाता है। प्रधानमंत्री के अभी तक के इस छोटे से कार्यकाल में मैंने सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया है। आम सहमति की राजनीति हमारी राजनीति है। कावेरी का ही उदाहरण ले। वर्षों से कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी के बीच में कावेरी के जल को लेकर विवाद चला आ रहा था। कभी-कभी तो विवाद ने अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया। जहाँ कहीं आग लगती है, वहीं पानी से उसे बुझाने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब पानी में ही आग लग जाए, तो उसका इलाज क्या है? इलाज है-समझदारी, भाईचारा, सहनशीलता, देशभक्ति और अपने हितों के साथ दूसरों के हितों के बारे में भी सोचना। हाल ही में हुआ कावेरी का समझौता इसी का परिचायक है। मेरी सरकार लगभग पिछले पांच महीनों में शासन के राष्ट्रीय एजेंडे में किए गए वायदों को पूरा करने के लिए बड़ी गंभीरता से प्रयास करती रही है। हमारी सरकार मिली-जुली सरकार है। मिली-जुली सरकार का अपना धर्म होता है, जिसका निष्ठापूर्वक पालन होना चाहिए। हमने अपने गठबंधन के लिए एक साझा कार्यक्रम, यानी एक नेशनल एजेंडा तैयार किया है। हमने सभी विवादास्पद मुद्दों को इस एजेंडे से बाहर रखा है। आज तक हमने जो भी किया है, वह राष्ट्रहित में किया है। हमने हमेशा राष्ट्रहित को दलहित से और व्यक्तिगत हित से ऊपर माना है।

राष्ट्र आज एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। आज हमारी पूरी राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के दौर से जा रही है। ऐसी स्थिति में हरेक दल को और हरेक राजनेता को जिम्मेदारी के साथ चलना होगा। राष्ट्रहित को चोट पहुँचाने वाले किसी भी कार्य के लिए इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। आम जनता को भी चाहिए कि वह मौजूदा राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था के बारे में गंभीरता से सोचे। हम सबके सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं। क्या बार-बार चुनाव होना देश के लिए अच्छी बात है? क्या इन चुनावों पर होने वाले भारी खर्च का बोझ बार-बार उठाना देशहित में है? मुझे प्रधानमंत्री का पद सँभाले केवल पाँच महीने हुए है। संसद में हमारा बहुमत बहुत कम है। मैं जानता हूँ कि साझा सरकारों की मर्यादाएँ होती हैं। मैं जानता हूँ कि आज की व्यवस्था में निर्दोष संन्यासी को सत्ता-पिपासु फाँसी पर चढ़ा देते हैं। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैने जीवन में कभी सत्ता के लालच में सिद्धांतों के साथ सौदा नहीं किया है, और न मैं भविष्य में करुँगा। सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेरे लिए एक जैसा है। मैं चालीस साल तक विपक्ष में रहा और अपने कर्तव्य का पालन करता रहा। मेरे विरोधी भी उसकी प्रशंसा करते हैं। लेकिन वैसा विरोध आज मुझे दिखाई नहीं देता, जब मैं कुर्सी पर बैठा हूँ। यह परिवर्तन क्यों हो गया है? आज मुझे डॉ० शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की एक कविता की ये पंक्तियाँ याद आती हैं:

क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं।
कर्तव्य पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही।
वरदान मांगूंगा नहीं, वरदान मौगूँगा नहीं।

मित्रांे, मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूँ कि कितनी भी आपत्तियों आएँ, हम वरदान के लिए झोली नहीं फैलाएँगे। आखिरी क्षण तक वरदान की तलाश नहीं करेंगे। न मैं संघर्ष का रास्ता छोडँूगा। जीवन में ऐसा क्षण आता है, जब व्यक्ति चौराहे पर खड़ा होकर सोचता है।

राह कौन-सी जाऊँ मैं? चौराहे पर लुटता चीर,
प्यादे से पिट गया वजीर।
चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़कर मैं विरक्ति बचाऊँ मैं,
राह कौन सी जाऊँ मैं?
मैं नहीं जा सकता। फिर लगता है नहीं, बाजी छोड़कर मैं
विरक्ति में नहीं जा सकता। मुझे जूझना होगा और फिर मैं लाल किले की
प्राचीर से आपकी उपस्थिति में अपने संकल्प को दोहराता हूँ।
हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कलाप पर लिखता-मिटाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद ।