वसुधैव कुटुम्बकम् पुरानी परिकल्पना हमारा विश्वास-सारा संसार एक परिवार

अतुलनीय अटलजी "व्यक्तित्व, विचार व विरासत"

अध्यक्ष महोदय, प्रतिनिधिगण

भारतवर्ष में हाल ही में एक ऐतिहासिक और अहिंसात्मक क्रांति हुई। गत मार्च में हुए चुनावों में भारतीय जनता ने मानव की दुर्दम्य आत्मशक्ति का परिचय दिया और एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज में अपनी आस्था की पुष्टि की। उन्होंने लोकतंत्र को नष्ट करने के तामसी तथा निरंकुश शक्तियों के धूर्ततापूर्ण प्रयत्नों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। हमारे देश की 6० करोड़ जनता के लिए मार्च की यह क्रांति स्पष्टतया दूरगामी महत्व रखती है, साथ ही समस्त संसार के स्वतंत्रता प्रेमी लोगों के लिए यह उतनी ही महत्वपूर्ण है।

हमारी जनता ने निर्भय होकर उन मूलभूत सिद्धांतों जीवन मूल्यों तथा आकांक्षाओं को परिपुष्ट किया, जिन पर संयुक्त राष्ट्र संघ की आधारशिला रखी गई थी। भारत के लोगों ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता और मूलभूत मानव अधिकार पुनः प्राप्त कर लिए। मैं भारतीय जनता की ओर से राष्ट्र संघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूँ। महासभा के इस 32वें अधिवेशन के अवसर पर में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की दृढ़ आस्था की पुनः व्यक्त करना चाहता हूँ। हमारा विश्वास है कि राष्ट्र संघ विश्व में शांति और सुरक्षा बनाये रखने और राष्ट्रों के बीच सहयोग के माध्यम से समानता, न्याय और समता पर आधारित शांतिपूर्ण प्रगति को प्रोत्साहित करने का उपकरण बनेगा ।

जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले छह माह भर हुए हैं। फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय है। भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुनः प्रतिष्ठित हो गये हैं। जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था, वह अब दूर हो गया है। ऐसे संवैधानिक कदम उठाये जा रहे हैं. जिनसे यह सुनिश्चित हो जाय कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा। लेकिन हम केवल इन उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं हैं। हमारी संसद में 22 जुलाई, 1977 को विधिवत इस बात की पुष्टि कर दी गई है कि भारत के लोग शांतिमय और वैध तरीकों से देश में एक ऐसी आर्थिक और सामाजिक क्रांति लाने के लिए कृत संकल्प हैं. जो लोकतांत्रिक भावनाओं से प्रदीप्त हो, समाजवादी आदर्शों से अनुप्राणित हो और नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की आधारशिला पर सुदृढ़ रूप से स्थित हो।

अध्यक्ष महोदय, मैं भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ में नया हूँ, मेरा देश नया नहीं है। इस संस्था की स्थापना के समय से ही भारत का इससे निकट सम्बन्ध रहा है। इस सम्मान्य सभा को सम्बोधित करते हुए मुझे बड़े गौरव का अनुभव हो रहा है। अपने देश में संसद का सदस्य होने के नाते, विश्व के देशों को इस सभा में पहली बार भाग लेते हुए मुझे विशेष उल्लास हो रहा है। अध्यक्ष महोदय, आपको अध्यक्ष पद पर आसीन देखकर और भी अधिक प्रसन्नता हो रही है क्योंकि आप एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं जो भारत के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है और जिसके साथ हमारे सुदृढ़ मैत्री सम्बन्ध हैं। भारत सरकार की ओर से और अपनी ओर से भी मैं संयुक्त राष्ट्र महासभा के 32वें अधिवेशन के सर्वानुमति से अध्यक्ष चुने जाने पर आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आपका चुनाव न केवल आपके विस्तृत राजनयिक अनुभवों और निजी विशिष्टताओं के प्रति आदर का द्योतक है, बल्कि आपके देश यूगोस्लाविया तथा उसके द्वारा शांति और स्थायित्व की शक्तियों को जो बल प्रदान किया जा रहा है उसके प्रति भी सम्मान का सूचक है। मैं आश्वासन देना चाहता हूँ कि आपको अपने पद का दायित्व निभाने में हमारा पूरा सहयोग मिलेगा। अन्य प्रतिनिधि मंडलों के साथ में भी संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डा0 कुर्ट वाल्डहाइम को हार्दिक बधाई देना चाहूँगा। वे अपने राष्ट्र संघ के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के साथ अपने जटिल दायित्व को निभा रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव और विश्व कल्याण को बढ़ाने में योगदान दे रहे है। जनता सरकार शांति, गुटनिरपेक्षता और सब देशों के साथ मैत्री की नीति का दृढ़ता से अनुसरण कर रही है। ये नीतियों सदा से भारत के राष्ट्रीय मतैक्य और परम्परा पर आधारित रही है। गुटनिरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय संप्रभुता का विस्तार है। इसका मूल तत्व तटस्थता न होकर स्वाधीनता है, जो उपनिवेशवाद के विरुद्ध हमारे राष्ट्रीय संघर्ष और दासता तथा दमन से मानव चेतना को मुक्ति का सहज परिणाम है। हम राष्ट्रों की सच्ची स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं। हमारी मान्यता है कि हर देश को अपने सर्वोत्तम राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नीति अनुसरण करने की तथा प्रत्येक समस्या पर गुणों के आधार पर विचार करने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। नई सरकार ने शासन संभालते ही न केवल गुटनिरपेक्षता के मार्ग पर चलते रहने की, अपितु उसके मौलिक तथा सकारात्मक रूप को पुनः प्रतिष्ठित करने की घोषणा की। यह संतोष का विषय है कि वास्तविक गुटनिरपेक्षता पर हमारे द्वारा दिए गए जोर और इस नीति को उत्साह और गतिशीलता से आगे बढ़ाने के हमारे निर्णय को सही मानों में देखा और समझा गया है।

अध्यक्ष महोदय, वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना पुरानी है। भारतवर्ष में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि संसार एक परिवार है। अनेकानेक प्रयत्नों और प्रयोगों के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के रूप में इस स्वप्न के अब साकार होने की संभावना है. क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता लगभग विश्वव्यापी हो गई है और वह 400 करोड़ लोगों का जो विभिन्न जातियों, रंगों और समुदायों के हैंं प्रतिनिधित्व करता है। फिर भी यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ केवल सरकारी प्रतिनिधिमंडलों का मिलनमंच मात्र न रहे। हमें इस लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए कि किस प्रकार राष्ट्रों की यह महासभा मानवता के सामूहिक विवेक और इच्छाशक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली भानव की संसद का रूप ले सके। संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणापत्र केवल राष्ट्र की ओर से या राष्ट्री के लिए किया गया आह्वान मात्र नहीं है। यह तो संसार के समस्त लोगों द्वारा किया गया सद्घोष है कि अपनी भावी पीड़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाये और सच्ची स्वतंत्रता के बातावरण में एक नई विश्व व्यवस्था की रचना की जाये। यहाँ मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा। आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए कही अधिक महत्व रखती है। अंततः हमारी सफलताएँ और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज वस्तुतः हर नर-नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में यत्नशील हैं। संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह समस्त मानवता का सबल स्वर बन सके और देशों के बीच एक-दूसरे पर अवलंबित सामूहिक कृति तथा सहयोग का गतिशील माध्यम बन सके। स्वयं अपने इतिहास और राजनीतिक अनुभव से हमने सीखा है कि वास्तविक सत्ता सरकारों में नहीं, जनता में निहित है, और जो उनकी इच्छा और समर्थन पर आश्रित है। आज से 30 वर्ष पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में जनता ने हथियार उठाए बिना बड़ी हिम्मत से एक शक्तिशाली साम्राज्य का सामना किया और उससे देश को मुक्ति दिलाई। इस वर्ष के प्रारंभ में हमारी जनता ने एक स्वार्थान्ध सत्ता के उन सब प्रयत्नों पा सफलतापूर्वक पानी फेर दिया जिनके द्वारा उनकी मूलभूत स्वतंत्रता को छीना जा रहा था। इस घटना से हमारे कई विदेशी मित्र-बंधुओं को आश्चर्य हुआ। परन्तु मुझे तो स्पष्ट है कि हमारे लोगों द्वारा प्रदर्शित महान राजनीतिक साहस की प्रेरणा हमारी प्रकृति और परंपरा से मिली है। सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केन्द्र बिन्दु व्यक्ति रहा है। हमारे धर्मग्रन्थों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्रह्मांड और सृष्टि का मूल व्यक्ति और उसका सम्पूर्ण विकास है। हमारी सदा मान्यता रही है कि ईश्वर के अनेक रूप हो सकते हैं। हर भारतवासी को. भले ही वह कहीं जन्मा हो या कोई भी आस्था रखता हो, अपने उद्धार और मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ने की स्वतंत्रता रही है। साथ ही हमारे मनीषियों ने वैदिक युग से लेकर अब तक सदा ही हमें अपने साथी मानवों के प्रति करुणा और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है। गांधीजी ने इस तत्व का सार उनके प्रिय शब्द ‘अंत्योदय’ में व्यक्त किया। अंत्योदय का अभिप्राय है। निम्नतम और निर्धनतम वर्गों के हितों की रक्षा और कल्याण, जिसके लिए प्रत्येक समाज को संलग्न रहना चाहिए।

मेरा विश्वास है कि हमारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में निरंतर सर्वोच्च स्थान मनुष्य, उसके सुख और कल्याण तथा मानव की आधारभूत एकता को मिलना चाहिए। मेरा अभिप्राय किसी आकृतिहीन मानव से नहीं है, जो अतीत काल में निरंकुशता को थोपने का बहाना रहा है. मेरा मतलब जीते-जागते मानव से है। उसकी संवेदनाएँ और अपेक्षाएँ, उसका सुख और दुख हमारे प्रयत्नों का केन्द्रबिन्दु होना चाहिए। अध्यक्ष महोदय, हम विश्व शांति के, ऐसी शांति के जो जीवन्त है, प्रबल समर्थक हैं। विश्व शांति हमारे सारे प्रयत्नों की आधारशिला है। शांति की परिभाषा केवल युद्ध न होना मात्र ही नहीं है। विश्व शांति का ताना-बाना किसी समय भी छिन्न-भिन्न हो सकता है। उसका संरक्षण तो केवल उन सामूहिक प्रयत्नांे से हो सकता है, जो राष्ट्रों के बीच विद्यमान भारी असमानता और असंतुलन को दूर कर सके, एक राष्ट्र पर दूसरे राष्ट्र के प्रभुत्व और शोषण का अंत कर सकें और संसार के समस्त लोगों को बराबरी के आधार पर अवसर और अधिकार प्रदान कर सकें। निस्संदेह हर देश अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण और संवर्धन करना चाहता है। पर कोई देश सबसे अलग-थलग होकर अपनी चहारदीवारी के भीतर नहीं रह सकता। हमें यह समझना होगा कि विश्व के देशों में पारस्परिक निर्भरता के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं है। इसी में विश्व मानव का कल्याण है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सब अपने-अपने राष्ट्रीय क्षितिजों के पार दृष्टि दौड़ाएँ। पारस्परिक सहकारिता और त्याग की प्रवृत्ति को बल देकर ही मानव समाज प्रगति और समृद्धि का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है।

जब भारत ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम छेड़ा था. तब से विश्व एक लंबा रास्ता तय कर चुका है। एक एशियाई देश के नाते हमने वियतनाम के बहादुर लोगों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झेले गये अपार कष्टों और अनगिनत बलिदानों को बड़ी संवेदना के साथ देखा। उनकी अंततः सफलता मानव की आत्मशक्ति की ज्वलंत परिचायक तथा दासता के विरूद्ध उकसे अदम्य प्रतिरोध के प्रति श्रद्धांजलि है। भारत, वियतनाम समाजवादी गणराज्य के संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश कर सहर्ष स्वागत करता है। नये अफ्रीकी राज्य लिबर्टी का भी हम हार्दिक अभिनन्दन करते है। इन दोनों देशों की सदस्यता से संयुक्त राष्ट्र संघ और भी विश्वव्यापी हो गया है। इन दोनों देशों के साथ भारत के मधुर मैत्री संबंध है और हम आशा करते हैं कि भविष्य में हमारे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी।

अध्यक्ष महोदय, महासभा के समक्ष जो कार्यसूची है उसकी महत्वपूर्ण समस्याएँ सम्मिलित हैं। इनमें ऐसे विशिष्ट प्रश्नों का उल्लेख चाहूँगा जिनका तात्कालिक महत्व है. और जिनको हमारे इस सामूहिक विचार-विनिमय में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या दक्षिणी अफ्रीका में मानव अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए हो रहे महान् संघर्ष की है। भारत ने सदैव ही राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अनावश्यक रक्तपात और हिंसा का विरोध किया है। हम अहिंसा में आस्था रखते है और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो। पराधीनता के अंधकारपूर्ण काल में भी भारत कतिपय आधारभूत सिद्धांतों पर दृढ़ था। ये सिद्धांत थे औपनिवेशिक दमन का तीव्र विरोध और रंगभेद के प्रत्येक रूप तथा मानव अधिकारों के प्रत्येक हनन की पूर्ण अस्वीकृति। इन सिद्धांतों के प्रति स्वतंत्र भारत की श्रद्धा आज भी अधिक गहरी हो गई है। इस दृष्टि से देखा जाये तो स्पष्ट है कि इजराइल ने बल प्रयोग द्वारा जिन क्षेत्रों पर अवैध रूप से कब्जा किया है, उसे मान्यता नहीं दी जा सकती। आक्रमण समाप्त होना ही चाहिए। यह भी आवश्यक है कि फिलिस्तीन के अरब लोगों को जिन्हें बलपूर्वक अपने घरों से उजाड़ दिया गया है, पुनः अपने देश में लौटने के अधिकार का उपयोग करने दिया जाये। इस क्षेत्र के सभी लोगों और राज्यों को अपने पड़ोसियों के साथ शांति और मेल-मिलाप से रहने का अधिकार है। इस भूखण्ड की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए यह एक आवश्यक शर्त है। हाल में इजराइल ने वेस्ट बैंक और गाजा में नयी बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है, संयुक्त राष्ट्र संघ को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक समस्याओं का महत्व अधिकाधिक बढ़ता जा रहा है। समानता और न्याय पर आधारित एक नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को विश्व समाज में मान्यता मिल गई है। अब इसे मूर्त रूप देने की दिशा में शीघ्र आगे बढ़ना है, जिससे विश्व के सभी नर-नारियों को अधिक न्यायसंगत और समुचित अवसर तथा अपने श्रम के लिए लाभ प्राप्त हो।

अध्यक्ष महोदय, मैं पहले इस बात का उल्लेख कर चुका हूॅ कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करने में अनेक अन्तर्विरोध और चुनौतियाँ है। दो दशकों से भी अधिक समय से अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर विचार विनिमय हो रहा है। परन्तु विकास दशक के लिए जो स्वरूप लक्ष्य निश्चित किये गये थे उनकी या तो अवहेलना कर दी गयी है या उन्हें पीछे ढकेल दिया गया है। बढ़ी हुई विषमताओं को कम करने के लिए विकसित देशों में संसाधनों और तकनीकी ज्ञान का पर्याप्त स्थानान्तरण नहीं हुआ। ऐसे तर्क और विचार प्रस्तुत किये जा रहे है, जो विकासशील देशों के सम्मुख खड़े गंभीर संकट का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं करते। संभवतः इसका कारण यह है कि विकसित देश अपनी स्वयं की समस्याओं और कठिनाइयों में उलझे हुए हैं। कई स्थितियों में तो जो एक हाथ से दिया जा रहा है, उसे दूसरे हाथ से वापस लिया जा रहा है। प्रायः यह दावा किया जाता है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी-प्रगति निर्धनता को दूर करने और उन्नति के लाभों को समस्त संसार में उपलब्ध करने की क्षमता रखती है किन्तु सत्य तो यह है कि विकासशील देशों को सही ढंग की तकनीक न मिलने के कारण धनी और निर्धन देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है।

निस्संदेह युद्धोपरान्त की दशाब्दियों में अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्य कर में कई गुना विस्तार हुआ है परन्तु उसका लाभ अधिकांशतः विकसित देशों को ही मिला है और उन्हीं देशों के लोगों के आर्थिक विकास तथा जीवनस्तर को ऊँचा उठाने में सहायक हुआ है। विकासशील देशों के लिए विभिन्न व्यापार संबंधी प्रतिबन्धों को शिथिल करने तथा निर्यातों के लाभकारी मूल्यों को सुरक्षित रखने की समस्याएँ आज भी उसी स्थिति में हैं. जो ऊर्जा के संकट के तुरंत बाद थी। तेल आयातक देशों की आर्थिक समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि कर्ज के बोझ को निरंतर बढ़ाने के अतिरिक्त उनके सम्मुख कोई अन्य उपचार नहीं दिखाई देता। इसमें संदेह नहीं कि विकसित देशों की अपनी आंतरिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएँ हैं, लेकिन उन्हें अपने दृष्टिकोणों और नीतियों को तात्कालिक तथा संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठाना आवश्यक है। यह पूछा जा सकता है कि क्या विकसित देशों के आर्थिक ढाँचे की समस्याओं के समाधान का युक्तिसंगत और प्रबुद्ध रास्ता यह नहीं है कि इन देशों से विकासशील देशों में विशिष्ट मात्रा में वित्तीय और प्रौद्योगिक क्षमता का स्थानान्तरण किया जाय? समृद्ध देशों को बेरोजगारी और आर्थिक उथल पुथल का समुचित समाधान संसार के तीन अरब लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होने पर ही हो सकता है। भारत ने इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय विचार-विमशों में उत्साह और ईमानदारी से भाग लिया है। हमारी मान्यता रही है कि संसार के आर्थिक रोगों का निवारण् संघर्ष की भावना को बल देने से नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पारस्परिक निर्भरता और सहयोग की नई भावना को जागृत करने से होगा।

अध्यक्ष महोदय, संसार में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे (अब हम पहले नम्बर पर हैं) नम्बर का देश होने के नाते, भारत की समस्याएँ भी बहुत जटिल है। हमारी प्रगति उल्लेखनीय है, लेकिन हमारे सम्मुख कई चुनौतियाँ विद्यमान हैं। एक ऐसे देश के नाते जिसने लोकतंत्र में अपनी आस्था पुनः व्यक्त की है और जो सहमति के आधार पर शासन चलाना चाहता है. हमारा काम और भी अधिक क्लिष्ट हो गया है। हमें गत कुछ दशकों तथा सदियों से जो अनेकानेक समस्याएँ विरासत में मिली हैं उन्हें हल करने के लिए हमारे पास न तो कोई जादू की छड़ी है और न कोई तुरत-फुरत समाधान। लेकिन हमंे आशा और विश्वास है कि हम सफल होंगे। स्वतंत्रता के विगत तीस वर्षों में हमारे लोगों ने अपनी परम्परागत प्रतिभा के बल पर विज्ञान और तकनीक द्वारा प्रस्तुत नये अवसरों के महत्त्व को समझा है और राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रगति के इन नवीन उपकरणों का प्रयोग करने की क्षमता दिखाई है। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की उपयोगिता को समझते हुए भी. हमारा प्रयास यही रहा है कि अपनी राष्ट्रीय प्रगति और आर्थिक स्वावलंबन के लिए हम अपने ही प्रयत्नों पर निर्भर रहे। हमारी नई सरकार नई प्राथमिकताओं को निश्चित करने और नियोजन तथा नीतियांे में जो विकृतियाँ आ गई थी, उन्हें दूर करने के लिए तत्पर है। आर्थिक क्षेत्र में अपने विकास के लिए हम औद्योगिक देशों की आँख मूंदकर नकल नहीं करना चाहते। हम ऐसे एकात्म नियोजन की ओर बढ़ना चाहते हैं, जिसका केन्द्र बिन्दु मानव हो। हम अपना ध्यान ग्रामीण विकास पर अधिक केन्द्रित करना चाहते हैं, वयोंकि हमारे देश की बहुसंख्यक जनता गाँवों में रहती है और उसका जीवन वहीं बीतेगा। हम आभिजात्य वर्ग के उपभोगवाद पर आधारित बहुलता नहीं चाहते। मनुष्य का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसके पास क्या है, बल्कि उसकी कसौटी यह है कि वह कैसा है? हम बेरोजगारों को रोजगार देना चाहते हैं और पिछड़े वर्गों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृतसंकल्प है। नगरों की ओर दौड़ने की प्रवृत्ति को उलटने या कम से कम रोकने की हमारी योजना है। विकासशील देशों के लिए यह एक बहुत बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्या बन गई है। कई दशक पहले गांधी जी ने इस बारे में चेतावनी दी थी।

अधिक सुहाने प्रभात के लिए जूझते हुए भी भारत अपने आर्थिक और तकनीकी अनुभव में अपने बराबर विकासशील देशों को सहभागी बनाने के लिए सदैव तत्पर रहा है। हम अपनी विभिन्न शिक्षा सस्थाओं में अन्य विकासशील देशों के हजारों छात्रों को प्रशिक्षण दे रहे है। हमारा विश्वास है कि यह विविधतापूर्ण प्रशिक्षण उन देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास में सहायक होगा। हम विकासशील देशों के बीच परस्पर लाभकारी सहयोग बनाने पर जोर दे रहे हैं और इससे हम केवल अपने लिए किसी प्रकार के राजनीतिक या आर्थिक लाभ की कामना नहीं करते।

अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व नहीं चाहता। जनता सरकार सभी देशों के साथ स्नेह, सहयोग और समझदारी के सेतु निर्माण करने के लिए सक्रिय है। सर्वप्रथम हमारा ध्यान नजदीकी पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्ध सुदृढ़ करने की ओर गया है। मैं यह मैत्री संदेश लेकर हाल ही में नेपाल, बर्मा और अफगानिस्तान गया था। पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को हम सुदृद्ध करना चाहते हैं जिससे न केवल स्थायी शान्ति कायम हो, बल्कि लाभदायक सहयोग में भी वृद्धि हो। इस समस्या ने हमारे पड़ोसी देश के साथ हमारे सम्बन्धों में पिछले कई वर्षों से बिगाड़ पैदा कर रखा था। समझौता हमारे इस विश्वास की पुष्टि करता है कि ऐसी जटिल समस्या को, जो दो पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है. ईमानदारी से प्रेरित द्विपक्षीय चर्चा के द्वारा ही हल किया जा सकता है। हल के लिए दोनों पक्षों को कुछ न कुछ त्याग करना पड़ता है और आदान प्रदान के आधार पर आगे बढ़ना होता है। पिछले एक वर्ष में दक्षिण एशिया के देशों में अनेक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं। फिर भी इन देशों के लोगों को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि दक्षिण एशिया पिछले कई दशकों की अपेक्षा आज तनाव से अधिक मुक्त है। यदि सचमुच दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो जाये, तो हम सब जिन पर विकास का सारा बोझ है अपने विकास की ओर अधिक ध्यान दे सकेंगे और अपने संसाधनों को विनाश से हटाकर विकास में लगा सकेंगे। वस्तुतः इसी संदर्भ में हम यह विशेष अपील करते हैं कि हमारे चारों तरफ के हिन्द महासागर के विशाल क्षेत्र को बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और सैनिक अड्डों से मुक्त रखा जाए, जिनका उपयोग आक्रमण के लिए हो सकता है। विस्तृत परिप्रेक्ष्य में भारत तनाव-शैथिल्य के प्रयत्नों का स्वागत करता है। भारत चाहता है कि तनाव-शैथिल्य केवल यूरोप तक न सीमित रहे, बल्कि विश्वव्यापी हो और उसके लाभ विश्व के सब देशों और लोगों को मिलें ।

वर्षानुवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ में अनगिनत प्रस्ताव पास किए गए हैं, जिनमें पूर्ण निरस्त्रीकरण, विशेषकर आणविक निरस्त्रीकरण की माँग की गई है। अणु शस्त्रों की दौड़ बहुत भयावह स्थिति में पहुँच गई है। विनाशकारी हथियारों के अंबार ने संसार को बड़ी विकट दुविधा में डाल दिया है। हमसे कहा जाता है कि युद्ध रोकने के लिए आणविक शरत्र आवश्यक है और यह कि इन शस्त्रों के प्रयोग का डर ही युद्ध की रोकथाम करने में समर्थ हो सकता है। हम इस दावे को स्वीकार नहीं करते। हमारी धारणा है कि आणविक शस्त्र खतरनाक है, भले ही वे एक के पास हों, कुछ देशों के पास हों या कई देशों के पास हों। हम केवल आणविक शस्त्रों के फैलाव के ही विरुद्ध नहीं है. वस्तुतः हम तो आणविक शस्त्रों के ही खिलाफ हैं। भारत सदा से ही आणविक शस्त्रों को प्राप्त करने और उन्हें विकसित करने का विरोधी रहा है। तथ्य तो यह है कि भारत पहला देश था जिसने संयुक्त राष्ट्र संघ में 20 वर्ष पूर्व समस्त आणविक शस्त्रों के परीक्षण पर रोक लगाने का मसला उठाया था। उस समय बड़ी शक्तियों हमारी बात को सुनने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं। जब वे तैयार हुई वो उन्होंने केवल आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि (पार्शियल टेस्ट बैन ट्रीटी) पर हस्ताक्षर किए। यह 15 वर्ष पूर्व की बात है। उस समय विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई और यह उम्मीद बंधी कि पूर्णरूपेण परीक्षण प्रतिबंध संधि (कंप्रीहैसिव टेस्ट बैन ट्रीटी) पर भी जल्दी ही समझौता हो जायेगा। लेकिन हम अभी भी उसकी राह देख रहे हैं। आंशिक प्रतिबंध लागू करने के बाद, पहले की बजाय, अधिक अणुशस्त्र परीक्षण हुए हैं। भूमिगत शव परीक्षण तो अभी भी जारी हैं। आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है।

हम उन सब कदमों और नीतियों का पहले की तरह विरोध करेंगे जो आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग में रुकावट डालेंगी, साथ ही हम उन सब कदमों और नीतियों का भी विरोध करेंगे जो भेदभावपूर्ण हैं। हम अन्य देशों के साथ इस समस्या पर पूर्ण सहयोग देने और चर्चा करने को तैयार है कि आणविक शस्त्रों के खतरे को किस प्रकार समाप्त किया जाये। यह नितांत आवश्यक है कि राजनीतिक दिमाग अपने आपको सैनिक तर्को से मुक्त रखें। यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति विवेक से काम लेकर आणविक शस्त्रों की होड़ को आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में पलट दे। हमें विश्वास है कि आगामी वर्ष निरस्त्रीकरण पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो विशेष अधिवेशन होने वाला है, उसमें आणविक निरस्त्रीकरण की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने की दिशा में ध्यान केन्द्रित होता और निरस्वीकरण में ऐसे उपाय जायेंगे जो एक निश्चित समयावधि मे सफलतापूर्वक कार्यान्वित किये जा सकें। पहले ही अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना में शस्त्रों की निरर्थक दौड़ में विश्व के सीमित संसाधनों के फंसे रहने से देरी हो रही है। वर्तमान कीमतों के आधार पर संसार काल सैन्य खर्च लगभग 400 अरब डालर है। इसका 20 प्रतिशत विकसित देश (ओ०डी०) से 20 गुना अधिक है। यदि शस्त्रों पर किये जाने वाले व्यय में चर्च कर रहे हैं जो विकासशील देशों को दी जाने वाली अधिकृत विकास सहायता लक्ष्य प्राप्त करने में भारी सहायता मिलेगी। अतः निरवीकरण न केवल शांति तथा 5 प्रतिशत की कमी हो जाये तो उससे विकासशील देशों से अपने सामान्य आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करने में न केवल शांति भंग तथा सुरक्षा के लिए बल्कि त्वरित आर्थिक सामाजिक प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसमें संदेह नही कि हमें काफी कुछ करना अभी बाकी है। हम अक्सर इच्छाशक्ति या प्रगति की कमी की शिकायत करते रहते है। लेकिन हमे हताश या निराश होने की जरूरत नहीं है। कई विफलताओं के बावजूद भी संयुक्त राष्ट्र संघ की उपलब्धियों बड़ी प्रभावशाली रही है। मैं आई०एल०ओ०, डब्ल्यूएचओ यूनेस्को, यूनीसेफ, एफ०ए०ओ०, अंकटाड, यूनीडी और संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य संस्थाओं के काम की प्रशंसा करना चाहता है। यदि इन्हें पर्याप्त धनराशि मिले तो ये संस्थाएँ मानव बाधाओं का निवारण करने और मानव कल्याण को बढ़ाने की दिशा में और भी बहुत काम कर सकती हैं। एक उदाहरण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मलेरिया के उन्मूलन के लिए किए गए उपाय है। आज मलेरिया पुनः अपना सिर उठा रहा है। इसके निराकरण के लिए डब्ल्यू०एच०ओ० द्वारा बनाये गए कार्यक्रम में लगभग 45 करोड़ डालर लगेगंे। यह राशि संसार में प्रतिदिन होने वाले सैन्य खर्च से आधी है। फिर भी धन के अभाव में यह कार्यक्रम पिछड़ रहा है।

अध्यक्ष महोदय, भारत का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का एक विश्व संगठन के रूप में समर्थन, सुदृढ़ीकरण तथा विकास होना चाहिए, जिससे न केवल विश्वशांति को संरक्षण तथा मानव अधिकारों का संवर्धन हो, बल्कि वह आर्थिक सहयोग की वृद्धि और राष्ट्रों के क्रियाकलाप में मेल बैठाने के दायित्व का भी निर्वाह कर सके। यह अंतर्राष्ट्रीय समाज के सम्मुख एक बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य है। अंत में, मैं पुनः अपने भाषण के मूल विषय पर आना चाहता हूँ। हमारे सम्मुख महानतम कार्य मानव कल्याण का है, जो मानवता के सम्मुख समुपस्थित सभी समस्याओं को स्वयं में समाहित करता है। यह कार्य मनुष्य की जाति, रंग, सम्प्रदाय या राष्ट्रीयता की परिधि से परे हैं हमारी सारी समस्याएँ-युद्ध और शाति का प्रश्न, आर्थिक संकट और तीव्र गति से समाप्त हो रहे प्राकृतिक संसाधन, सब हमें एक ही निष्कर्ष पर ले जाते हैं हमारे इस पारस्परिक निर्भर संसार में हममें से प्रत्येक अपने भाई का रखवाला है। हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय, जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा वह है मानव का भविष्य। मानव को यह पृथ्वी विरासत में मिली है और उसने इस धरती का विकास किया है और इससे स्वयं पोषण पा रहा है। यदि हम यह अनुभव करते हैं कि मानव की अस्तित्व रक्षा अन्य करोड़ों मानवों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है, जैसी कि पहले कभी नहीं थी, तो हम अपने समय के इस एकमात्र निष्कर्ष पर पहुंच जाएँगे कि राष्ट्रीय प्रभुसत्ता का अंतर्राष्ट्रीय परस्पर निर्भरता के साथ निश्चित रूप से मेल बैठाना चाहिए।

मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूँ कि हम एक विश्व के आदशों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसकी कीर्ति के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे पग नहीं हटाएँगे। जय जगत।